पिंजरे में मुनिया – अकबर इलाहाबादी

मुंशी कि क्लर्क या ज़मींदार लाज़िम है कलेक्टरी का दीदार  हंगामा ये वोट का फ़क़त है मतलूब हरेक से दस्तख़त है हर सिम्त मची हुई है हलचलहर दर पे शोर है कि चल-चल टमटम हों कि गाड़ियां कि मोटरजिस पर देको, लदे हैं वोटर शाही वो है या पयंबरी हैआखिर क्या शै ये मेंबरी है … Read more

भोले-भाले / अशोक चक्रधर

व्यंग 1. जिज्ञासा एका एक मंत्री जी कोई बात सोचकर मुस्कुराए,कुछ नए से भाव उनके चेहरे पर आए। उन्होंने अपने पी.ए. से पूछा— क्यों भई,ये डैमोक्रैसी क्या होती है?पी.ए. कुछ झिझका सकुचाया, शर्माया। -बोलो, बोलो डैमोक्रैसी क्या होती है?-सर, जहां जनता के लिए जनता के द्वारा जनता की ऐसी-तैसी होती है, वहीं डैमोक्रैसी होती है। … Read more

नारी /निधि चौधरी

कविता छंदमुक्त रचना नारी“””””””मैं नारी को….पीड़ा के समानार्थी पढूं,तो चलेगा क्या? जहां नारी हो….पीड़ा पहुँच ही जाती है।और जहाँ पीड़ा हो,वहाँ दवा बन जाती है नारी। एक पत्थर पर….छेनी के वार से एक नारी गढूंतो चलेगा क्या? छेनी के प्रहार सह कर ही तोपलती है नारी।सहने पड़ते है ये प्रहारअंतिम साँसों तक। मैं नारी को….एक … Read more

ससुर जी उवाच /अशोक चक्रधर

ससुर जी उवाच डरते झिझकतेसहमते सकुचातेहम अपने होने वालेससुर जी के पास आए,बहुत कुछ कहना चाहते थेपर कुछबोल ही नहीं पाए। वे धीरज बँधाते हुए बोले-बोलो!अरे, मुँह तो खोलो। हमने कहा-जी. . . जीजी ऐसा हैवे बोले-कैसा है? हमने कहा-जी. . .जी ह़महम आपकी लड़की काहाथ माँगने आए हैं। वे बोलेअच्छा!हाथ माँगने आए हैं!मुझे उम्मीद … Read more

देखते हुए –  अनीता वर्मा 

देखना, सोचना, समझनायही मैंने सीखा हैयही मेरे मनुष्य होने की विशेषता हैपर कई बार देखते हुए सोचना कठिन होता हैऔर सोचते हुए समझना भी उतना ही कठिनसोचती हूँ एक फूल को कैसे समझा जाएक्या यह सम्भव है फूल में बदले बिनाकैसे महसूस किया जाए उसकी पंखुरियों का झरना  एक-एक करमैं अगर झरी हुई पत्तियों वाला … Read more

जय हिन्द की “नारी”

निधि चौधरी मैं आज इस महफ़िल से,जय हिन्द की नारी कहती हूँ।है गर्व मुझे कि मैं तो,भारत देश मे रहती हूँ।मैं आज इस महफ़िल से,जय हिन्द की नारी कहती हूँ। १ जिस धरा पे तुमने जन्म लिया,उस धरा को नित्य नमन करो।ये तन मन हो जाए देश के नाम,अब ऐसा कुछ तो जतन करो।।हाँ भारत … Read more

शक्ति और क्षमा –  रामधारी सिंह “दिनकर” 

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबलसबका लिया सहारापर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसेकहो, कहाँ, कब हारा?क्षमाशील हो रिपु-समक्षतुम हुये विनत जितना हीदुष्ट कौरवों ने तुमकोकायर समझा उतना ही।अत्याचार सहन करने काकुफल यही होता हैपौरुष का आतंक मनुज कोमल होकर खोता है। क्षमा शोभती उस भुजंग कोजिसके पास गरल होउसको क्या जो दंतहीन विषरहित, विनीत, सरल हो।तीन दिवस … Read more

कलम या कि तलवार – दिनकर

रामधारी सिंह दिनकर दो में से क्या तुम्हे चाहिए कलम या कि तलवारमन में ऊँचे भाव कि तन में शक्ति विजय अपार अंध कक्ष में बैठ रचोगे ऊँचे मीठे गानया तलवार पकड़ जीतोगे बाहर का मैदान कलम देश की बड़ी शक्ति है भाव जगाने वाली,दिल की नहीं दिमागों में भी आग लगाने वाली पैदा करती … Read more

पहला पानी –  केदारनाथ अग्रवाल 

कविता पहला पानी गिरा गगन सेउमँड़ा आतुर प्यार,हवा हुई, ठंढे दिमाग के जैसे खुले विचार ।भीगी भूमि-भवानी, भीगी समय-सिंह की देह,भीगा अनभीगे अंगों कीअमराई का नेहपात-पात की पाती भीगी-पेड़-पेड़ की डाल,भीगी-भीगी बल खाती हैगैल-छैल की चाल ।प्राण-प्राणमय हुआ परेवा,भीतर बैठा, जीव,भोग रहा हैद्रवीभूत प्राकृत आनंद अतीव । रूप-सिंधु कीलहरें उठती,खुल-खुल जाते अंग,परस-परसघुल-मिल जाते हैंउनके-मेरे रंग … Read more

पिया मुंबई त बनल देहरादून बा
आइल मानसून बा न – सुरेश मिश्र

कजरी पिया मुंबई त बनल देहरादून बाआइल मानसून बा न कोरोना के बढ़ते प्रकोप, काम बंद होने के कारण बेरोजगारी की मार, खान-पान की कमी और भुखमरी के कारण , अपने माता-पिता से मिलने के लिए मुंबई से प्रियतम अपने गांव चले गए। मानसून आने से पूर्व ही निसर्ग तूफान आ गया। पूरी मुंबई में … Read more