इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का – अदम गोंडवी

वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई हैउसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी काउधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर लेहमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई … Read more

रूप की रानी /उमेश नंदन सिन्हा

कानों में है झुमका तेरे ,भाल पर सुन्दर टीका,,इस सुन्दरता के आगे है ,सबकुछ लगता फीका ,भौहें भी प्रत्यंचा सी हैं ,रूप का बाण चलातीं ,भावुक जन यहाँ जितने ,उनको मुग्ध ,मुग्ध कर जातीँ ।कजरारी आंखों की शोभा ,अनुपम बहुत निराली ,सुन्दर गोरी तुम लगती हो सचमुच में मतवाली ।अधर तुम्हारे सुन्दर ,सुन्दर ,मन्द ,मन्द … Read more

उम्र – पंखुड़ी सिन्हा

जैसे सुबह उठकर कोई शीशे में देखे,कि कुछ बाल कनपटी पर सफ़ेद हो गए हैं,कि एक रेखा खिंचती है गालों में, अब हँसने पर,वैसे सुबह उठकर लड़की ने शीशे में देखा,कि अब वह बिल्कुल प्यार नहीं करती,उस आदमी से, जिसके साथ,उसका तथाकथित प्यार का रिश्ता है,और ज़िन्दगी उसके लिए आसान हो गई। आते-जाते वक़्त एक … Read more

आशा का दीपक – रामधारी सिंह दिनकर

वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है;थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है।चिन्गारी बन गयी लहू की बून्द गिरी जो पग से;चमक रहे पीछे मुड़ देखो चरण-चिह्न जगमग से।बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नहीं है;थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है।☼ ☼ ☼ अपनी … Read more

उलझ कर रह गयी है फाइलों के जाल में – अदम गोंडवी

जो उलझ कर रह गयी है फाइलों के जाल मेंगाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में बूढ़ा बरगद साक्षी है किस तरह से खो गयीराम सुधि की झौपड़ी सरपंच की चौपाल में खेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गएहम को पट्टे की सनद मिलती भी है तो ताल में

काजू भुने पलेट में, विहस्की गिलास में — अदम गोंडवी

काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास मेंउतरा है रामराज विधायक निवास में पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैतइतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरहजो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा देंसंसद बदल गयी है यहाँ की … Read more

भूख के एहसास को शेरो-सुख़न तक ले चलो – अदम गोंडवी

भूख के एहसास को शेरो-सुख़न तक ले चलोया अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो जो ग़ज़ल माशूक के जल्वों से वाक़िफ़ हो गयीउसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो मुझको नज़्मो-ज़ब्त की तालीम देना बाद मेंपहले अपनी रहबरी को आचरन तक ले चलो गंगाजल अब बूर्जुआ तहज़ीब की पहचान हैतिशनगी … Read more

आज सड़कों पर – दुष्यंत कुमार

  आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,पर अन्धेरा देख तू आकाश के तारे न देख । एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ,आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख । अब यकीनन ठोस है धरती हक़ीक़त की तरह,यह हक़ीक़त देख लेकिन ख़ौफ़ के मारे न देख । वे सहारे भी … Read more

मंत्र हूं – दुष्यंत कुमार

मंत्र हूँ तुम्हारे अधरों में मैं!एक बूँद आँसू में पढ़कर फेंको मुझकोऊसर मैदानों परखेतों खलिहानों परकाली चट्टानों पर….।मंत्र हूँ तुम्हारे अधरों में मैं आज अगर चुप हूँधूल भरी बाँसुरी सरीखा स्वरहीन, मौन;तो मैं नहींतुम ही हो उत्तरदायी इसके।तुमने ही मुझे कभीध्यान से निहारा नहीं,छुआ या पुकारा नहीं,छिद्रों में फूँक नहीं दी तुमने,तुमने ही वर्षों सेअपनी … Read more

कैद परिंदो का ब्यान – दुष्यंत कुमार

तुमको अचरज है–मैं जीवित हूँ!उनको अचरज है–मैं जीवित हूँ!मुझको अचरज है–मैं जीवित हूँ! लेकिन मैं इसीलिए जीवित नहीं हूँ–मुझे मृत्यु से दुराव था,यह जीवन जीने का चाव था,या कुछ मधु-स्मृतियाँ जीवन-मरण के हिंडोले परसंतुलन साधे रहीं,मिथ्या की कच्ची-सूती डोरियाँसाँसों को जीवन से बाँधे रहीं;नहीं–नहीं!ऐसा नहीं!! बल्कि मैं जिंदा हूँक्योंकि मैं पिंजड़े में क़ैद वह परिंदा … Read more