Tag: कविता

  • कविता : देव और दानव बच न सके !

    मधुबाला मौर्या

    तुमको है अभिमान दशानन
    भगवती हर के लाये हो
    प्राण पखेरू उड़ जायेंगे
    दर्शन होंगे जब रघुवर के,

    तुमको है अभिमान दुशाशन
    केश खींच के लाये हो
    प्राण पखेरू उड़ जायेंगे
    दर्शन होंगे जब मुरलीधर के,

    कहे कवयित्री मधुबाला
    नारी का सम्मान करो
    देव और दानव बच न सके
    यहाँ विष्णु भी पाषाण हु ll

  • प्रगति पथ पर चलता चल

    मधुबाला मौर्या

    प्रगति पथ पर चलता चल
    निश्छल भाव से बहता चल
    रुक कर थोड़ा साहस भर ले
    किन्तु, प्रगति पथ पर चलता चल,

    स्मरण -विस्मरण करता चल
    अपने वजूद को इंगित कर
    प्रलय नहीं प्रहलाद बन तु
    प्रगति पथ पर चलता चल,

    कुछ न कुछ तो सिमटेगा
    कुछ न कुछ तो मिटेगा
    अस्तित्व निखर कर आएगा
    प्रगति पथ पर चलता चल,

    अभ्यास नहीं आभास कर तु
    मूर्त नहीं अमूर्त बन तु
    सोच नहीं विश्वास बन तु
    प्रगति पथ पर चलता चल,

    गाँधी के विचार से
    भगत के बलिदान से
    आशा से विश्वास से
    अपनों के आशीर्वाद से –
    मंजिल के तटस्थ हो
    प्रगति पथ पर चलता चल.

  • “आएंगी लौट फिर से खुशियां अपने देश पर”

    समोद शर्मा

    “आएंगी लौट फिर से खुशियां अपने देश पर”
    ना जाने नजर किसकी लगी, खुशियों के देश पर खेल रहे थे खेल सब, अपने ही मेल परचल रही थी जिंदगी, अपने स्वाव परथाम दिए पग बैरी ने, आकर के ताव पर।

                    ना जाने नजर किसकी………थीं इक तरफ हसरतें, कुछ करने की राह परकर दिए सब खाक ख्वाब, बैरी ने आकर के ताव परबन गया नासूर, दिल के गुलिस्तां जहान परफल रहा है ऐसे, अहि फलता है गरल पर।

                       ना जाने नजर किसकी……लगा रहा है विष ये, गहरे हरे घाव परबेचैन मन, अनहोनी का डर, रहता है रात भरनिरंकुश ये, अदृश्य बैरी, इठलाता अपनी चाल परघूमता निरंकुश बैरी, निरीह, जग को मारकर।

                      ना जाने नजर किसकी……छीनी हंसी जग की, जिंदगी दरबदर कीछीने सुहाग इसने, गोद मां की सूनी कीरोकेगा कौन शूरवीर, इसके पांव कोमांगे यही मन्नतें, करके फरियाद को।

                      ना जाने नजर किसकी……थी तमन्ना ये, वक्त गुजर जाए हंसकरदेख खुशी जमाने की, क्यों जल गया कालचक्रदेखो, कैसे हंस रहा ये पापी, जग को रुलाकरपहुंचेगी जिंदगी, ना जाने किस मुकाम पर।

                    ना जाने नजर किसकी…….पिंजड़ों में है कैद, घर लगे यूं, दिखावे नाम भरडर रहा है जग का मालिक भी, मानो इसके नाम पर।

                  ना जाने नजर किसकी……..दूर रहें कैसे हम, बैरी से खुद को बचाकरस्वाभिमानी इतना ये, ना हमको दिखाई देखुद्दार बैरी इतना, बिन बुलाए आए नाबस चूक ढूंढ़ इंसा की, ये खाए चबाकर।

                        ना जाने नजर किसकी…..संकल्प लें ये मन में,न चूक हो कोईशातिर हो ये कितना, ना भूल हो कोईअदृश्य हो ये कितना भी, न इसको दिखाई देंभयमुक्त रहें सजग, इल्म खुद का जगाकर।आएंगी लौट फिर से खुशियां अपने देश परआएंगी लौट फिर से खुशियां अपने देश पर।

    लेखक परिचय समोद शर्मा। शिक्षक, शिक्षा इनिशिएटिव, शिव नादर फाउंडेशन, नोएडा, यूपी

  • कान्हा मैं तेरी दीवानी /निधि चौधरी

    कान्हा मैं तेरी दीवानी
    “”””””’’’”””””””””””””””
    मैं मीरा नहीं हूँ नहीं राधे रानी।
    सुनो मेरे कान्हा मैं तेरी दिवानी,

    कि मुरली के धुन पे मैं वारी जाऊँ,
    मैं तुझ पे ओ मोहन बलिहारी जाऊँ।
    तू चंदन सा पावन मैं पानी पानी,
    सुनो मेरे कान्हा मैं तेरी दिवानी।

    वो वृंदावन की सुनहरी गालियां,
    वो बागों में खिलती महकती कलियां।
    तेरे प्रीत की हूँ मैं बहती रवानी,
    सुनो मेरे कान्हा मैं तेरी दीवानी।

    मेरे दिल मे जब से कन्हैय्या समाया,
    ये संसार मैंने महकता सा पाया।
    तू खुशियों की दुनिया मे ग़म की कहानी,
    सुनो मेरे कान्हा मैं तेरी दीवानी।

    मैं मीरा नहीं हूँ नहीं राधे रानी।
    सुनो मेरे कान्हा मैं तेरी दिवानी,
    निधि चौधरी

  • डाकिया

    माया गोविंद

    डाकिये ने द्वार खटखटाया
    अनबाँचा पत्र लौट आया |
    साँझ थी और हाथ में था सांझ का दिया
    डाकिये ने द्वार तभी खटखटा दिया
    मेरा अहि लिखा पत्र हाथ में दिया
    डाकिया तो चल दिया बुझा दिया दिया |
    ये दिया बुझा तो बुझा आस का दिया
    अब तो कोई ज़िन्दगी का दिल बुझा दिया
    इंतज़ार भी थका, थका मेरा जिया
    फिर ना कहना मैंने इंतज़ार ना किया
    जब दिए ने ही दिया बुझाया
    अनबाँचा पत्र लौट आया |

    डाकिये ने द्वार खटखटाया
    अनबाँचा पत्र लौट आया |

    याद फिर से आयी उस घर की दहलीज़
    अस्त व्यस्त कमरा और बिखरी हर चीज़
    ननदी की हलचल और सासू की खीज़
    तुलसी का बिरवा और वो कजरी तीज
    धुली धुली चादर पे सेहमल के बीज
    बिछिया और पायल की छेड़ बद्तमीज़
    फिर मुझको याद आया प्रेम का मरीज़
    चोरे चोरे नैना बिन बटन की कमीज
    याद ने अतीत को चुराया
    अनबाँचा पत्र लौट आया |

    डाकिये ने द्वार खटखटाया
    अनबाँचा पत्र लौट आया |

    जीवन का कागज़ है , कलम ये सफ़र
    स्याही के जैसा है रात का प्रहर
    प्यास है सम्बोधन , आँसू हैं सिताक्षर
    गगन के लिफ़ाफ़े पर चाँद की मुहर
    प्रेम ही पता है, अनजान है नगर
    दुनिया डाकघर, गायब पोस्टमास्टर
    जीव डाकिये ने, डाक बांटी उम्र भर
    फिर भी एक खत ना मिला सही पते पर
    उत्तर की जगह प्रश्न पाया
    अनबाँचा पत्र लौट आया |

    डाकिये ने द्वार खटखटाया
    अनबाँचा पत्र लौट आया |

    माया गोविंद . फेसबुक वॉल से

  • मैं अश्कों में बहतें तराने लिखूंगी -निधि चौधरी

    मैं अश्कों में बहतें तराने लिखूंगी,
    बुरे दौर के कुछ फ़साने लिखूंगी।

    कि दुनिया हमारी है जालिम बहुत ही,
    वो मासूम दिखते सयाने लिखूंगी।

    सदाकत, रफ़ाक़त, मुहब्बत हमारी,
    ये सारे कुचलते ज़माने लिखूंगी।

    सिकंदर हज़ारों ज़माने में लेकिन,
    मैं हारे हुए दास्ताने लिखूंगी।

    इबादत है बिकती हां भक्ति भी बिकती,
    मैं सच बोलते वो मय’खाने लिखूंगी।

    ज़मीं से उठा के फ़लक पे बिठाया,
    मैं दिल जीतते वो दिवाने लिखूंगी।

    बुराई से लबरेज़ दुनिया है फिर भी,
    फरिश्तों के कुछ आशियाने लिखूंगी।

    मुझे कर के यूँ दर ब दर जाने वाले,
    कतल करते किस्से पुराने लिखूंगी।

    “मलीका” मग़र कुछ फरिश्तों से यारी,
    कि यारी को अब मैं खजाने लिखूंगी।

  • संवेदनहीनता

    निधि चौधरी


    “”””””””’””””””””””
    नूर लिखूं, बेनूर लिखूं,
    जीस्त नशे में चूर लिखूं।
    नाते जल गए अग्नि कुंड में,
    किसका यह कुसूर लिखूं।
    बिच्छू पाले डंक सम्हाले,
    कैसे उनको मस्तूर लिखूं।
    ज़र्रे ज़र्रे दर्द ही पाया हमने,
    क्या दर्द को अपने तूर लिखूं।
    कलयुग का यह रूप भयावह,
    कलयुग के कैसे दस्तूर लिखूं।

  • परवीन शाकिर की तीन बेहतरीन रचनाएं

    (१) उलझन

    रात भी तन्हाई की पहली दहलीज़ पे है
    और मेरी जानिब अपने हाथ बढ़ाती है
    सोच रही हूं
    उनको थामूं
    ज़ीना-ज़ीना सन्नाटों के तहख़ानों में उतरूं
    या अपने कमरे में ठहरूं
    चांद मेरी खिड़की पर दस्तक देता है

    (२)बारिश

    बारिश में क्या तन्हा भीगना लड़की!
    उसे बुला जिसकी चाहत में
    तेरा तन-मन भीगा है
    प्यार की बारिश से बढ़कर क्या बारिश होगी!
    और जब इस बारिश के बाद
    हिज्र की पहली धूप खिलेगी
    तुझ पर रंग के इस्म खुलेंगे।

    (३) हमारे दरमियान

    हमारे दरमियाँ ऐसा कोई रिश्ता नहीं था 
    तेरे शानों पे कोई छत नहीं थी 
    मेरे ज़िम्मे कोई आँगन नहीं था 
    कोई वादा तेरी ज़ंज़ीर-ए-पा बनने नहीं पाया 
    किसी इक़रार ने मेरी कलाई को नहीं थामा 
    हवा-ए-दश्त की मानिन्द 
    तू आज़ाद था 
    रास्ते तेरी मर्ज़ी के तबे थे 
    मुझे भी अपनी तन्हाई पे 
    देखा जाये तो 
    पूरा तसर्रुफ़ था 
    मगर जब आज तू ने 
    रास्ता बदला 
    तो कुछ ऐसा लगा मुझ को 
    के जैसे तूने मुझ से बेवफ़ाई की

  • पिंजरे में मुनिया – अकबर इलाहाबादी

    मुंशी कि क्लर्क या ज़मींदार

    लाज़िम है कलेक्टरी का दीदार 

    हंगामा ये वोट का फ़क़त है

    मतलूब हरेक से दस्तख़त है

    हर सिम्त मची हुई है हलचल
    हर दर पे शोर है कि चल-चल

    टमटम हों कि गाड़ियां कि मोटर
    जिस पर देको, लदे हैं वोटर

    शाही वो है या पयंबरी है
    आखिर क्या शै ये मेंबरी है

    नेटिव है नमूद ही का मुहताज
    कौंसिल तो उनकी हि जिनका है राज

    कहते जाते हैं, या इलाही
    सोशल हालत की है तबाही

    हम लोग जो इसमें फंस रहे हैं

    अगियार भी दिल में हंस रहे हैं
    दरअसल न दीन है न दुनिया

    पिंजरे में फुदक रही है मुनिया

    स्कीम का झूलना वो झूलें

    लेकिन ये क्यों अपनी राह भूलें
    क़ौम के दिल में खोट है पैदा

    अच्छे अच्छे हैं वोट के शैदा

    क्यो नहीं पड़ता अक्ल का साया

    इसको समझें फ़र्जे-किफ़ाया
    भाई-भाई में हाथापाई

    सेल्फ़ गवर्नमेंट आगे आई

    पाँव का होश अब फ़िक्र न सर की 

    वोट की धुन में बन गए फिरकी

  • नारी /निधि चौधरी

    कविता

    छंदमुक्त रचना

    नारी
    “””””””
    मैं नारी को….
    पीड़ा के समानार्थी पढूं,
    तो चलेगा क्या?

    जहां नारी हो….
    पीड़ा पहुँच ही जाती है।
    और जहाँ पीड़ा हो,
    वहाँ दवा बन जाती है नारी।

    एक पत्थर पर….
    छेनी के वार से एक नारी गढूं
    तो चलेगा क्या?

    छेनी के प्रहार सह कर ही तो
    पलती है नारी।
    सहने पड़ते है ये प्रहार
    अंतिम साँसों तक।

    मैं नारी को….
    एक मशीन कहूँ
    तो चलेगा क्या?

    मशीन ही तो है नारी,
    सुबह तुम्हे जगाने से लेकर,
    रात को तुम्हारे नींद आने तक।
    और तुम्हारे स्टोर रूम से लेकर
    तुम्हारे सिरहाने तक।

    मैं नारी को…..
    मध्यम सा संगीत कह दूं,
    तो चलेगा क्या?

    एक नारी की उपस्थिति,
    तुम्हे ठीक ऐसा ही तो सुकूँ देती है।
    जैसे हवाओं के संग बह कर,
    फूल खुशबू देती है।

    मैं नारी को…
    खिलौने वाली गुड़िया कह दूं
    तो चलेगा क्या?

    गुड़िया ही तो है जिसे अपने हिसाब से
    लिबास पहनाते हो तुम।
    और अपनी चाबी से ही घुमाते हो तुम।

    मैं नारी को….
    मौन कह दूं
    तो चलेगा क्या?

    हाँ सदियों से मौन ही तो है,
    तुझे आँचल में दूध पिलाने से लेकर,
    तेरे द्वारा नथुनी से नाथ देने पर भी मौन।

    अच्छा सुनो मैं नारी को….
    महिषासुर मर्दनी कह दूँ
    तो चलेगा क्या?

    हाँ मैं ही तो हूँ जिनके चरणों में तुम
    नित शीश झुकाते हो,
    पहचानो मुझे, और मेरे अस्तित्व को,
    जिसे तुम रोज झुकाते हो।
    जिसे तुम रोज झुकाते हो।

    निधि चौधरी
    चित्र – गूगल साभार