Tag: कविता

  • पिंजरे में मुनिया

    अकबर इलाहाबादी

    मुंशी कि क्लर्क या ज़मींदार
    लाज़िम है कलेक्टरी का दीदार

    हंगामा ये वोट का फ़क़त है
    मतलूब हरेक से दस्तख़त है

    हर सिम्त मची हुई है हलचल
    हर दर पे शोर है कि चल-चल

    टमटम हों कि गाड़ियां कि मोटर
    जिस पर देको, लदे हैं वोटर

    शाही वो है या पयंबरी है
    आखिर क्या शै ये मेंबरी है

    नेटिव है नमूद ही का मुहताज
    कौंसिल तो उनकी हि जिनका है राज

    कहते जाते हैं, या इलाही
    सोशल हालत की है तबाही

    हम लोग जो इसमें फंस रहे हैं
    अगियार भी दिल में हंस रहे हैं

    दरअसल न दीन है न दुनिया
    पिंजरे में फुदक रही है मुनिया

    स्कीम का झूलना वो झूलें
    लेकिन ये क्यों अपनी राह भूलें

    क़ौम के दिल में खोट है पैदा
    अच्छे अच्छे हैं वोट के शैदा

    क्यो नहीं पड़ता अक्ल का साया
    इसको समझें फ़र्जे-किफ़ाया

    भाई-भाई में हाथापाई
    सेल्फ़ गवर्नमेंट आगे आई

    पंव का होश अब फ़िक्र न सर की
    वोट की धुन में बन गए फिरकी






  • यह क्या हो रहा है

    अकबर इलाहाबादी

    कोई हँस रहा है कोई रो रहा है
    कोई पा रहा है कोई खो रहा है

    कोई ताक में है किसी को है गफ़लत
    कोई जागता है कोई सो रहा है

    कहीँ नाउम्मीदी ने बिजली गिराई
    कोई बीज उम्मीद के बो रहा है

    इसी सोच में मैं तो रहता हूँ ‘अकबर’
    यह क्या हो रहा है यह क्यों हो रहा है

  • तुम इतना खुश कैसे रह लेते हो ?

    तलाश जिंदगी की थी,
    दूर तक निकल पड़े,
    जिंदगी मिली नहीं,
    तज़ुर्बे बहुत मिले,
    किसी ने मुझसे कहा कि,
    तुम इतना ख़ुश कैसे रह लेते हो?

    तो मैंने कहा कि,
    मैंने जिंदगी की गाड़ी से,
    वो साइड ग्लास ही हटा दिये,
    जिसमेँ पीछे छूटते रास्ते और,
    बुराई करते लोग नजर आते थे!

    छोडो़ ना यार, क्या रखा है सुनने और सुनाने को,
    हम मस्ती में जीते हैं जलने दो जमाने को!

    (साभार: सोशल मीडिया)

  • जीवन क्या है -श्री आर सी प्रसाद सिंह

    श्री आर सी प्रसाद सिंह की कविता ।

    यह जीवन क्या है? निर्झर है, मस्ती ही इसका पानी है।
    सुख-दुख के दोनों तीरों से चल रहा राह मनमानी है।

    कब फूटा गिरि के अंतर से? किस अंचल से उतरा नीचे?
    किस घाटी से बह कर आया समतल में अपने को खींचे?

    निर्झर में गति है, जीवन है, वह आगे बढ़ता जाता है!
    धुन एक सिर्फ़ है चलने की, अपनी मस्ती में गाता है।

    बाधा के रोड़ों से लड़ता, वन के पेड़ों से टकराता,
    बढ़ता चट्टानों पर चढ़ता, चलता यौवन से मदमाता।

    लहरें उठती हैं, गिरती हैं; नाविक तट पर पछताता है।
    तब यौवन बढ़ता है आगे, निर्झर बढ़ता ही जाता है।

    निर्झर कहता है, बढ़े चलो! देखो मत पीछे मुड़ कर!
    यौवन कहता है, बढ़े चलो! सोचो मत होगा क्या चल कर?

    चलना है, केवल चलना है ! जीवन चलता ही रहता है !
    रुक जाना है मर जाना ही, निर्झर यह झड़ कर कहता है !

  • शिक्षक दिवस विशेष ! गुरु – शिष्य परंपरा ??

    मधुबाला मौर्या

    प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा
    भक्त भयो न कोई हनुमंत वीरा
    चीर के सीना प्रतिबिम्ब दर्शाये
    ऐसी श्रद्धा भाव और भक्ति

    प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा
    पार्थ भयो न कोई अर्जुन जैसा
    विश्व रूप दर्शा गये
    गीता का उपदेश बतला गये

    प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा
    शिष्य भयो न कोई एकलव्य के जैसा
    द्रोणाचार्य पद पंकज नावहिं सीसा
    अंगूर देहि गुरुदक्षिणा परंपरा निभायी

    प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा
    भक्त भयो न कोई शबरी जैसा
    वन मे जाकर दर्शन देते
    गुरु भक्त की लाज बचाते

    प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा
    भक्त भयो न कोई उंगलिमाल के जैसा
    डाकू से साधु बन बैठा
    रामचरित मानस लिख बैठा

  • पक्ष और विपक्ष

    मधुबाला मौर्या

    कुछ पक्ष में बोलेंगे
    कुछ विपक्ष में बोलेंगे
    कुछ की सहमति होगी
    कुछ की असहमति होंगी
    कुछ देख के बोलेंगे कुछ गढ़ के बोलेंगे

    कुछ तो कड़वा बोलेंगे कुछ मीठा बोलेंगे
    कुछ एक सुर में बोलेंगे कुछ अलग से बोलेंगे
    कुछ सबको बोलेंगे कुछ तुमको बोलेंगे
    कुछ तो बोल चुके कुछ बाकि है

    कुछ तो हर बात पे बोलेंगे या कुछ पर ही बोलेंगे
    ये जो हर कुछ पे किच- किच करते है
    ना खुद पढ़ेंगे ना तुमको पढ़ने देंगे
    ना खुद बढ़ेंगे ना तुमको बढ़ने देंगे

    ना खुद सुधरेंगे ना तुमको सँवरने देंगे
    हर बात पे काटेंगे हर बात पे टोकेंगे
    इनकी दकियानूसी दूर भगाओ
    इनको अपने से ही दूर बिठाओ

    कहे कवयित्री मधुबाला
    नारी के उत्थान में
    उनके स्वाभिमान में
    लोगों को जागरूक बनाओ

    ऐसे दो मुंह सापो से
    नारी को सम्मान दिलाओ

  • गर सीखना हो तो !

    मधुबाला मौर्या

    ज़िन्दगी में एकता में बल सियारों से सीखिये
    ज़िन्दगी में एक साथ चलना चींटियों से सीखिए

    ध्यान लगाना दाना चुगने वाले कबूतरों से सीखिये
    और स्वामी भक्ति कुकुर से सीखिए

    प्रेम करना पपीहा से सीखिये
    छल करना लोमड़ी से सीखिये

    मुर्ख बनना कौवों से सीखिये
    रंग बदलना छिपकली से सीखिये

    छीन लेना कपियो से सीखिये
    तूफान आने पर बचना हो तो कछुए से सीखिए

    ज़िन्दगी में निश्चिंत और खुशहाल रहना हो तो गज महाराज से सीखिए
    झुण्ड में रहना हो तो सुकर से सीखिये

    राजा बनना हो तो शेर से सीखिये
    बीवी बनना हो तो शेरनी से सीखिए

    गर ज़िन्दगी में कुछ न बनना हो तो फिर
    बकरे से मिलिए

  • कविता :समझ जाती हैं हम लड़कियां

    निधि चौधरी

    समझ जाती हैं हम लड़कियां
    “”””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””
    समझ जाती हैं हम लड़कियां,
    हर व्यवहार तुम्हारे।
    मन मे पलने वाले,
    विचार तुम्हारे।

    समझ जाती हैं हम लड़कियां,
    यूँ भीड़ में जानबूझ कर,
    तुम्हारा हमसे से टकरा जाना।

    समझ जाती है हम लड़कियां
    कुछ ढूंढती हुई,
    उन गन्दी नज़रों को…..
    जिन्हें देख सम्हालने लगते है हम,
    अपनी चुनरी अपने दुपट्टे को।
    और फिर रास्ता बदल कर चल देतें हैं
    हम नज़रंदाज़ कर के तुम्हारी गन्दी नज़रों को।

    समझ जाती हैं हम लड़कियां,
    अजनबी जगह पर,
    हमें घूरती हुई उन आंखों को।
    जो यह सोच लेते है कि……
    अकेली लड़कियां खुली तिजोरी होती है।

    हम लड़कियां समझ जाती हैं,
    तुम्हारे हर एक कमेंट को,
    हमे सड़क पर जाता देख,
    तुम तिरछी आंखों से,
    हम पर करते हो।

    डर जाती हैं हम लड़कियां
    अकेले आखरी बस या ट्रेन से
    सफ़र करते हुए।

    हम लड़कियां सहम जाती हैं
    सूरज डूबने के बाद,
    और सांझ ढलने से पहले,
    दौड़ परते हैं सुरक्षित होने के लिए,
    अपने पिता, भाई, पति और बेटे के छावं में……

    फिर याद आता है,
    यूँ जान बूझकर
    टकरा जाने वाले,
    वो चील जैसे नज़रों से घूरने वाले,
    हम लड़कियों पर गंदे कमेंट करने वाले।
    वो भी तो होंगे ,
    किसी बहन के भाई….
    किसी माँ का बेटा….
    या फिर किसी बेटी का पिता….
    Nidhi Choudhary

  • अंत ही आरंभ है …

    मधुबाला मौर्या

    अंत और आरम्भ
    एक ही डोर के दो छोर

    चलते है साथ-साथ
    रहते है एकसाथ

    आरम्भ सीखता जाता है
    अंत सिखला जाता है

    क्षण भर में, जीव का अंत
    या निर्जीव -जीव हो जाता

    आरम्भ है तभी तो अंत है
    गर अंत नहीं तो आरम्भ कहाँ?

    आरम्भ में, मैं – मैं ही हूं
    अंत में, मैं – तुम हूं ।।

  • मेरी सिमरन मेरी बेटी !

    मधुबाला मौर्या

    तेरे बचपन की खिलखिलाती हँसीं देखती हूं
    निःशब्द उसमें विचरण करती हूं,
    तेरी बचकानी हरकतों में
    अपना बचपन देखती हूं ।

    तेरी जिद्द, अहंकार देखती हूं
    न भुल पाने वाला व्यक्तित्व देखती हूं,
    हर दूसरे को डांटने का खोजना बहाना
    खाना छोड़ के रूठ जाना
    कुण्डी लगा के हर बात मनवा लेना,
    तेरे बचकानी हरकतों में अपना बचपन देखती हूं ।

    एक दिन मैं भी वृद्ध हो जाउंगी
    तब शायद स्मरण -विस्मरण भी कर न पाऊँगी,
    तब मैं भी अपने माँ के जैसे
    आस लगाए बैठूँगी
    बिटिया मेरी आएगी

    झुर्रियाँ पड़ी इन हँडिया पर
    अपने कोमल हाथों से,
    धीरे से सहलाएगी
    माँ -माँ करके मुझको
    सीने से लिपट जाएगी,

    कहे कवयित्री मधुबाला
    छोड़ गयी जो तन्हा माँ को
    वृद्ध अबला को अंत समय में
    कंठ प्यासे ही रह जाएंगे
    प्राण पखेरू उड़ जायेंगे
    बस दो बूँद पानी को II