Category: कहानी

  • उच्च कुल के अभिमान से मुक्ति ।

    वृद्धावस्था मैं आचार्य रामानुज एक ब्राह्मण शिष्य का सहारा लेकर गंगा स्नान के लिए जाते थे । लौटते वक्त वह एक वंचित विद्यार्थी के कंधे पर हाथ रख लेते थे ।उनके इस व्यवहार पर कुछ रूढ़िवादी तिल मिलाते थे

    उनमें से एक न एक दिन उनसे कुछ रुष्ट होकर कह ही डाला आचार्य गंगा स्नान से शुद्ध होकर आपको वंचित के शरीर का सहारा लेना उचित नहीं है ।

    आचार्य ने हंसते-हंसते उत्तर दिया जिसे आप वंचित मानते हैं , स्नान के पश्चात उसके कंधे पर मैं इसलिए हाथ रखता हूं कि अपने उच्च कुल और उच्च जाति का अभिमान धो सकूं । क्योंकि इस अभिमान को पानी से धोने में मैं असमर्थ हूं ।

  • आप के दुकान में ईश्वर मिलेंगे ?

    आठ साल का एक बच्चा एक रूपये का सिक्का मुट्ठी में लेकर एक दुकान पर जाकर कहा आपके दुकान में ईश्वर मिलेंगे?
    दुकानदार ने यह बात सुनकर सिक्का नीचे फेंक दिया और बच्चे को निकाल दिया। बच्चा पास की दुकान में जाकर 1 रूपये का सिक्का लेकर चुपचाप खड़ा रहा! ए लड़के । 1 रूपये में तुम क्या चाहते हो? मुझे ईश्वर चाहिए। आपके दुकान में है? दूसरे दुकानदार ने भी भगा दिया।


    लेकिन, उस अबोध बालक ने हार नहीं मानी। एक दुकान से दूसरी दुकान, दूसरी से तीसरी, ऐसा करते करते कुल चालीस दुकानों के चक्कर काटने के बाद एक बूढ़े दुकानदार के पास पहुंचा। 
    उस बूढ़े दुकानदार ने पूछा: तुम ईश्वर को क्यों खरीदना चाहते हो? क्या करोगे ईश्वर लेकर?
    पहली बार एक दुकानदार के मुंह से यह प्रश्न सुनकर बच्चे के चेहरे पर आशा की किरणें लहराईं৷ लगता है इसी दुकान पर ही ईश्वर मिलेंगे! 


    बच्चे ने बड़े उत्साह से उत्तर दिया: इस दुनिया में मां के अलावा मेरा और कोई नहीं है। मेरी मां दिनभर काम करके मेरे लिए खाना लाती है। मेरी मां अब अस्पताल में हैं। अगर मेरी मां मर गई तो मुझे कौन खिलाएगा ? डाक्टर ने कहा है कि अब सिर्फ ईश्वर ही तुम्हारी मां को बचा सकते हैं। क्या आपके दुकान में ईश्वर मिलेंगे?
    दुकानदार: हां, मिलेंगे! कितने पैसे हैं तुम्हारे पास?
    बच्चा: सिर्फ एक रूपए।
    दुकानदार: कोई दिक्कत नहीं है। एक रूपए में ही ईश्वर मिल सकते हैं।
    दुकानदार बच्चे के हाथ से एक रूपए लेकर उसने पाया कि एक रूपए में एक गिलास पानी के अलावा बेचने के लिए और कुछ भी नहीं है। इसलिए उस बच्चे को फिल्टर से एक गिलास पानी भरकर दिया और कहा, यह पानी पिलाने से ही तुम्हारी मां ठीक हो जाएगी।


    अगले दिन कुछ मेडिकल स्पेशलिस्ट उस अस्पताल में गए। बच्चे की मां का अॉप्रेशन हुआ। और बहुत जल्द ही वह स्वस्थ हो उठीं।
    डिस्चार्ज के कागज़ पर अस्पताल का बिल देखकर उस महिला के होश उड़ गए। डॉक्टर ने उन्हें आश्वासन देकर कहा: टेंशन की कोई बात नहीं है। एक वृद्ध सज्जन ने आपके सारे बिल चुका दिए हैं। साथ में एक चिट्ठी भी दी है। 


    महिला चिट्ठी खोलकर पढ़ने लगी, उसमें लिखा था, मुझे धन्यवाद देने की कोई आवश्यकता नहीं है। आपको तो स्वयं ईश्वर ने ही बचाया है.. मैं तो सिर्फ एक ज़रिया हूं। यदि आप धन्यवाद देना ही चाहती हैं तो अपने अबोध बच्चे को दिजिए जो सिर्फ एक रूपए लेकर नासमझों की तरह ईश्वर को ढूंढने निकल पड़ा। उसके मन में यह दृढ़ विश्वास था कि एकमात्र ईश्वर ही आपको बचा सकते है। विश्वास इसी को ही कहते हैं। ईश्वर को ढूंढने के लिए करोड़ों रुपए दान करने की ज़रूरत नहीं होती, यदि मन में अटूट विश्वास हो तो वे एक रूपए में भी मिल सकते हैं।

  • आम का पेड़

    एक बच्चे को आम का पेड़ बहुत पसंद था।

    जब भी फुर्सत मिलती वो आम के पेड के पास पहुच जाता।

    पेड के उपर चढ़ता,आम खाता,खेलता और थक जाने पर उसी की छाया मे सो जाता।

    उस बच्चे और आम के पेड के बीच एक अनोखा रिश्ता बन गया।

    बच्चा जैसे-जैसे बडा होता गया वैसे-वैसे उसने पेड के पास आना कम कर दिया।

    कुछ समय बाद तो बिल्कुल ही बंद हो गया।

    आम का पेड उस बालक को याद करके अकेला रोता।

    एक दिन अचानक पेड ने उस बच्चे को अपनी तरफ आते देखा और पास आने पर कहा,

    “तू कहां चला गया था? मै रोज तुम्हे याद किया करता था। चलो आज फिर से दोनो खेलते है।”

    बच्चे ने आम के पेड से कहा,
    “अब मेरी खेलने की उम्र नही है

    मुझे पढना है,लेकिन मेरे पास फीस भरने के पैसे नही है।”

    पेड ने कहा,
    “तू मेरे आम लेकर बाजार मे बेच दे,
    इससे जो पैसे मिले अपनी फीस भर देना।”

    उस बच्चे ने आम के पेड से सारे आम तोड़ लिए और उन सब आमो को लेकर वहा से चला गया।

    उसके बाद फिर कभी दिखाई नही दिया।

    आम का पेड उसकी राह देखता रहता।

    एक दिन वो फिर आया और कहने लगा,
    “अब मुझे नौकरी मिल गई है,
    मेरी शादी हो चुकी है,

    मुझे मेरा अपना घर बनाना है,इसके लिए मेरे पास अब पैसे नही है।”
    आम के पेड ने कहा,

    “तू मेरी सभी डाली को काट कर ले जा,उससे अपना घर बना ले।”
    उस जवान ने पेड की सभी डाली काट ली और ले के चला गया।

    आम के पेड के पास अब कुछ नहीं था वो अब बिल्कुल बंजर हो गया था।

    कोई उसे देखता भी नहीं था।
    पेड ने भी अब वो बालक/जवान उसके पास फिर आयेगा यह उम्मीद छोड दी थी।

    फिर एक दिन अचानक वहाँ एक बुढा आदमी आया। उसने आम के पेड से कहा,

    “शायद आपने मुझे नही पहचाना,
    मैं वही बालक हूं जो बार-बार आपके पास आता और आप हमेशा अपने टुकड़े काटकर भी मेरी मदद करते थे।”

    आम के पेड ने दु:ख के साथ कहा,

    “पर बेटा मेरे पास अब ऐसा कुछ भी नही जो मै तुम्हे दे सकु।”

    वृद्ध ने आंखो मे आंसु लिए कहा,

    “आज मै आपसे कुछ लेने नही आया हूं बल्कि आज तो मुझे आपके साथ जी भरके खेलना है,

    आपकी गोद मे सर रखकर सो जाना है।”

    इतना कहकर वो आम के पेड से लिपट गया और आम के पेड की सुखी हुई डाली फिर से अंकुरित हो उठी।

    वो आम का पेड़ कोई और नही हमारे माता-पिता हैं दोस्तों ।

    जब छोटे थे उनके साथ खेलना अच्छा लगता था।

    जैसे-जैसे बडे होते चले गये उनसे दुर होते गये।
    पास भी तब आये जब कोई जरूरत पडी,
    कोई समस्या खडी हुई।

    आज कई माँ बाप उस बंजर पेड की तरह अपने बच्चों की राह देख रहे है।

    जाकर उनसे लिपटे,
    उनके गले लग जाये

    फिर देखना वृद्धावस्था में उनका जीवन फिर से अंकुरित हो उठेगा।

    सोशल मीडिया से साभार

  • रोगी और वैद?


    एक महात्मा अपने शिष्यों के साथ  एक घर में भोजन करने गए .

    भोजन में बहुत से दुराचारी भी आए थे । संत ने सबके साथ समभाव और स्नेह से बात की और आनंद पूर्वक भोजन किया ।

    विरोधियों को यह समाचार ज्ञात हुआ तो उन्होंने संत के अनुयायियों को ताने दिए तुम्हारे गुरु को यह दुराचारी ही मिले बात करने के लिए क्या कोई इस गांव में सब सज्जन नहीं रहता ।

    बात जब संत तक पहुंची तो विरोधियों के अज्ञानता की बात सोचकर वे दुखी हो गए और बोले भाई उनसे पूछो कि वैद्य की आवश्यकता किसे होती है ।

    स्वस्थ व्यक्ति को या रोगी को

    जितने भी दुराचारी है वह मानसिक आत्मिक रोग ही तो है जिसका निवारण करना संत का कर्तव्य है

  • सभ्यता और शिष्टाचार ?


    एक बार फ्रांस का राजा चतुर्थ हेनरी अपने शरीर रक्षक के साथ पेरिस की आम सड़क से जा रहा था ।

    तभी एक भिखारी ने अपने सिर की टोपी उतार कर उसका अभिवादन किया प्रत्युत्तर में हेनरी ने भी अपना सिर झुकाया ।

    यह देख वह शरीर रक्षक  बोला महाराज आप जैसे सम्राट का एक तुच्छ भिखारी को अभिवादन करना शोभा नहीं देता ।

    शोभा देता है या नहीं यह तो तुम लोगों के सोचने की बात है मेरी नहीं  ।

    राजा आगे बोला

    यदि मैंने उसे अभिवादन न किया होता तो मेरे अंतर्मन की मनुष्यता मुझे कोसती रहती की । है तो तू फ्रांस का सम्राट किंतु तुझ में एक भिखारी के जितने भी सभ्यता और शिष्टाचार नहीं ।

  • मनुष्य के प्रकार ?


    प्रवचन के उपरांत एक जिज्ञासु राजा ने भगवान बुद्ध से प्रश्न किया महाराज आपने अभी-अभी कहा कि मनुष्य चार प्रकार के होते हैं ? कृपया समझाएं भगवान बुद्ध ने उत्तर दिया मनुष्य चार प्रकार के होते हैं । एक तिमिर से तिमिर में जाने वाला , दूसरा तिमिर से ज्योति की ओर जाने वाला, तीसरा ज्योति से तिमिर की ओर जाने वाला और चौथा ज्योति से ज्योति में जाने वाला । 


    राजन यदि कोई मनुष्य चांडाल आदि हीन कुल में जन्म ले और जन्म भर दुष्कर्म करने में बिताए तो उसे में तिमिर से तिमिर में जाने वाला कहता हूं ।

    यदि कोई मनुष्य हीन कुल में जन्म लें तथा खाने-पीने की तकलीफ होने पर भी मन वचन कर्म से सत्कर्म का आज चरण करें तो मैं ऐसे मनुष्य को तिमिर से ज्योति में जाने वाला कहता हूं ।

    यदि कोई मनुष्य अच्छे कुल में जन्म ले खाने-पीने की कमी ना हो शरीर भी रूपवान और बलवान हो किंतु मन वचन तथा काया से वह दुराचारी हो तो मैं उसे ज्योति से तिमिर में जाने वाला कहता हूं । 

    किंतु जो मनुष्य अच्छे कुल में जन्म लेकर सदैव सदाचरण की साधना करता हो तो मैं उसे ज्योति से ज्योति में जाने वाला मनुष्य मानता हूं ।


     साभार :प्रेरक प्रसंग मानव वाटिका के सुरभित पुष्प 

  • मेहनत की कमाई ।

     महात्मा टॉलस्टॉय एक बार बहुत साधारण से कपड़े पहने स्टेशन के प्लेटफार्म पर घूम रहे थे ।एक स्त्री ने उन्हें कुली समझा और बुलाकर कहा , यह पत्र लेकर सामने के होटल में मेरे पति को दे आओ मैं तुम्हें 2 रूबल दूंगी । टालस्टाय ने  पत्र पहुंचा दिया और उन्होंने 2 रूबल लिए ही थे कि उनका एक मित्र वहां आ पहुंचा , उसने काउंट कहकर उनका अभिवादन किया यह सुनकर उस स्त्री को बड़ा ही आश्चर्य हुआ और उसने उस नव आगंतुक से पूछा यह कौन है ?टॉलस्टॉय का परिचय प्राप्त कर हुआ महिला बेहद लज्जित हुई और उसने क्षमा मांगते हुए अपने रूबल वापस मांगे । इस पर वो हंसते हुए बोले देवी जी क्षमा करना तो परमात्मा का काम है मैंने काम करके पैसे लिए हैं अपनी मेहनत की कमाई क्यों मैं आपको लौटा दूं ।

  • गिरवी के पत्थर ।

    एक बार गुरु नानक बगदाद गए हुए थे । वहां का शासक बड़ा ही अत्याचारी एवं अन्याय था । वह जनता को कष्ट देकर उनकी संपत्ति को लूट कर अपने खजाने में जमा किया करता था । उसे जब मालूम हुआ कि हिंदुस्तान से कोई साधु पुरुष आया है तो वह नानक जी से मिलने उनके पास गया कुशल समाचार पूछने के उपरांत नानक जी ने उससे एक सौ पत्थर गिरवी रखने की विनती की । शासक बोला पत्थर को गिरवी रखने में कोई आपत्ति नहीं । किंतु आप उन्हें लेकर जाएंगे आपके पूर्व ही मेरी मृत्यु होगी मेरे मरणोपरांत इस संसार में आप की जीवन यात्रा समाप्त होने पर जब आप मुझसे मिलेंगे तब इन पत्थरों को मुझे दे दीजिएगा  नानक जी बोले । आप भी कैसी बातें करते हैं महाराज भला इन पत्थरों को लेकर मैं वहां कैसे जा सकता हूं । तो फिर जनता को चूस चूस कर आप जो अपने खजाने में वृद्धि किए जा रहे हैं । क्या वह सब यही छोड़ेंगे या उसे भी अपने साथ ही ले जाएंगे बस साथ में मेरे इन पत्थरों को भी लेते आइएगा । उस दुराचारी की आंखें खुल गई नानक जी के चरणों पर गिरकर उनसे क्षमा मांगी और प्रजा को कष्ट ना देने का वचन दिया।

  • क्या जाने किस भेष में ?

    संत एकनाथ कमंडल में गंगाजल भरकर काशी से रामेश्वरम की यात्रा कर रहे थे । गर्मी के दिन थे मिलो तक पानी नहीं मिलता था । संत एकनाथ ने देखा कि एक गधा प्यास से तड़प कर मृत प्राय हो चुका है ।उन्होंने पानी का कमंडल उसके मुंह में उड़ेल दिया ।गधा जी उठा शिष्यों ने देखा तो बोले महाराज यह आपने क्या कर दिया । अब भगवान शिव का अभिषेक कैसे होगा ।

    तब एकनाथ जी ने परम तृप्ति के आदेश में कहा अरे क्या तुमने नहीं देखा स्वयं देवाधिदेव रामेश्वर शिव ही तो गधे के रूप में यहां आए थे इतने कृपालु है वह स्वयं ही आ गए और हमें वहां तक जाने का कष्ट नहीं दिया उन्होंने

  • प्रेरक कहानियां ! जो जीवन बदल दे

    आपकी मूर्ति कहां है ?


    सिकंदर की राजधानी में एक सुंदर बगीचा था । उसमें प्राचीन और विद्यमान पराक्रमी पुरुषों की मूर्तियां खड़ी की गई थी ।एक बार सिकंदर की राजधानी देखने के लिए एक विदेशी मेहमान आया । वह सिकंदर का मेहमान था अतः उसे साही अतिथि गृह में ठहराया गया ,सिकंदर उसे अपना बगीचा दिखाने के लिए अपने साथ ले गया वहां रखी हुई मूर्तियों के बारे में मेहमान के पूछने पर यह किसकी मूर्ति है . सिकंदर उसके बारे में उचित जानकारी देता , सारी मूर्तियां देखने के बाद मेहमान ने पूछा महाराज आप की मूर्ति कहीं भी दिखाई नहीं दे रही हैं ।सिकंदर ने जवाब दिया मेरी मूर्ति यहां रखी जाएं और फिर अगली पीढ़ी या प्रश्न करें यह मूर्ति किसकी है उसकी अपेक्षा मुझे यह अधिक अच्छा लगेगा कि मेरी मूर्ति ही ना रखी जाए और लोग पूछे कि सिकंदर की मूर्ति क्यों नहीं है।