Category: कहानी

  • कर भला तो हो भला

    मधुबाला मौर्या

    कर भला तो हो भला
    एक बुढ़िया थी। वह बहुत ही ग़रीब और अंधी थीं। उसके एक बेटा और बहू थे।


    वह बुढ़िया सदैव गणेश जी की पूजा किया करती थी।
    एक दिन गणेश जी प्रकट होकर उस बुढ़िया से बोले-
    ‘बुढ़िया मां! तू जो चाहे सो मांग ले।’
    बुढ़िया बोली- ‘मुझसे तो मांगना नहीं आता। कैसे और क्या मांगू?’


    तब गणेशजी बोले – ‘अपने बहू-बेटे से पूछकर मांग ले।’
    तब बुढ़िया ने अपने बेटे से कहा- ‘गणेशजी कहते हैं ‘तू कुछ मांग ले’ बता मैं क्या मांगू?’
    पुत्र ने कहा- ‘मां! तू धन मांग ले।’


    बहू से पूछा तो बहू ने कहा- ‘नाती मांग ले।’
    तब बुढ़िया ने सोचा कि ये तो अपने-अपने मतलब की बात कह रहे हैं।


    अत: उस बुढ़िया ने पड़ोसिनों से पूछा, तो उन्होंने कहा- ‘बुढ़िया! तू तो थोड़े दिन जीएगी, क्यों तू धन मांगे और क्यों नाती मांगे।


    तू तो अपनी आंखों की रोशनी मांग ले, जिससे तेरी ज़िन्दगी आराम से कट जाए।’


    इस पर बुढ़िया बोली- ‘यदि आप प्रसन्न हैं, तो मुझे नौ करोड़ की माया दें, निरोगी काया दें, अमर सुहाग दें, आंखों की रोशनी दें, नाती दें, पोता, दें और सब परिवार को सुख दें और अंत में मोक्ष दें।’


    यह सुनकर तब गणेशजी बोले- ‘बुढ़िया मां! तुने तो हमें ठग दिया। फिर भी जो तूने मांगा है वचन के अनुसार सब तुझे मिलेगा।’


    और यह कहकर गणेशजी अंतर्धान हो गए। उधर बुढ़िया मां ने जो कुछ मांगा वह सबकुछ मिल गया।


    सीख : मनुष्य वही है जिसके ह्रदय मे सबके लिए उदारता है

  • नारी का सम्मान

    मधुबाला मौर्या


    स्वामी विवेकानंद की ख्याति देश – विदेश में फैली हुई थी। एक बार कि बात है। विवेकानंद समारोह के लिए विदेश गए थे। और उनके समारोह में बहुत से विदेशी लोग आये हुए थे ! उनके द्वारा दिए गए स्पीच से एक विदेशी महिला बहुत ही प्रभावित हुईं।

    और वह विवेकानंद के पास आयी और स्वामी विवेकानंद से बोली कि मैं आपसे शादी करना चाहती हुँ ताकि आपके जैसा ही मुझे गौरवशाली पुत्र की प्राप्ति हो।

    इसपर स्वामी विवेकानंद बोले कि क्या आप जानती है। कि ” मै एक सन्यासी हूँ ” भला मै कैसे शादी कर सकता हूँ अगर आप चाहो तो मुझे आप अपना पुत्र बना लो। इससे मेरा सन्यास भी नही टूटेगा और आपको मेरे जैसा पुत्र भी मिल जाएगा। यह बात सुनते ही वह विदेशी महिला स्वामी विवेकानंद के चरणों में गिर पड़ी और बोली कि आप धन्य है। आप ईश्वर के समान है ! जो किसी भी परिस्थिति में अपने धर्म के मार्ग से विचलित नहीं होते है।

    कहानी से शिक्षा

    स्वामी विवेकानंद के इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है कि सच्चा पुरुष वही होता है जो हर परिस्थिति में नारी का सम्मान करे

  • कहानी : हाथी और छह अंधे व्यक्ति की कहानी

    प्रेरणा दायक कहानी


    एक समय की बात है, एक गांव में 6 अंधे व्यक्ति रहते थे। वह बड़ी खुशी के साथ आपस मे रहते थे। एक बार उनके गांव में एक हाथी आया। जब उनको इस बात की जानकारी मिली, तो वो भी उस हाथी को देखने गये।

    लेकिन अंधे होने के कारण उन्होंने सोचा हम भले ही उस हाथी को न देख पाए, लेकिन छूकर ज़रूर महसूस करेंगे कि हाथी कैसा होता है।वहां पहुंच कर उन सभी ने हाथी को छूना शुरू किया। हाथी को छूकर एक अंधा व्यक्ति बोला, हाथी एक खंभे की माफिक होता है, मै अब अच्छे से समझ गया हूं, क्योंकि उसने हाथी के पैरों को महसूस किया था।


    तभी दूसरा व्यक्ति हाथी की पुंछ पकड़ कर बोला “अरे नहीं, हाथी तो रस्सी की तरह होता है।” तभी तीसरा व्यक्ति भी बोल पड़ा “अरे नही, मैं बताता हूँ, यह तो पेड़ के तने की तरह होता है”“तुम लोग क्या बात कर रहे हो, हाथी तो एक बड़े सूपे की तरह होता है”, चौथे व्यक्ति ने कान को छूते हुए सभी को समझाया।
    तभी अचानक पांचवें व्यक्ति ने हाथी के पेट पर हाथ रखते हुए सभी को बताया “अरे नहीं-नहीं , यह तो एक दीवार की तरह होता है।


    “ऐसा नहीं है, हाथी तो एक कठोर नली की तरह होता है”, छठे व्यक्ति ने अपनी बात रखी। सभी के अलग अलग मत होने के कारण उन सभी में बहस होने लगी, और खुद को सही साबित करने में लग गए। उनकी बहस तेज होती गयी और ऐसा लगने लगा मानो वो आपस में लड़ ही पड़ेंगे।


    तभी वहां से एक बुद्धिमान व्यक्ति गुज़र रहा था। उनकी बहस को देखकर, वह वहां रुका और उनसे पूछा, “क्या बात है, तुम सब आपस में झगड़ा क्यों कर रहे हो?” उन्होंने बहस का कारण बताते हुए, उस बुद्धिमान व्यक्ति को बताया कि हम यह नहीं तय कर पा रहे हैं, कि आखिर हाथी दिखता कैसा है”, उन्होंने ने उत्तर दिया।


    फिर एक एक करके उन्होंने अपनी बात उस व्यक्ति को समझायी। बुद्धिमान व्यक्ति ने सभी की बात शांति से सुनी और बोला, “तुम सब अपनी-अपनी जगह सही हो, तुम्हारे वर्णन में अंतर इसलिए है, क्योंकि तुम सबने हाथी के अलग-अलग भागों को छुआ एवं महसूस किया।


    लेकिन यदि देखा जाए, तो तुम लोग अपनी अपनी जगह ठीक हो, क्योंकि जो कुछ भी तुम सबने बताया, वो सभी बाते हाथी के वर्णन के लिए सही बैठती हैं”।
    अब तक सभी को सारी बातें समझ आ गयी थी। उसके बाद उस बुद्धिमान व्यक्ति ने उन्हें समझाया यदि आप सब अपने जो जो महसूस किया, उसके अलावा भी यदि आगे कुछ देखते तो आप को हाथी असल मे कैसा होता है समझ आ जाता।


    सीख दोस्तों,

    अधिकतर ऐसा होता है, कि हम सच्चाई जाने बिना अपनी बात को लेकर अड़ जाते हैं, कि हम ही सही हैं, और बाकी सब गलत है। लेकिन कई बार ऐसा होता है, कि हम केवल सिक्के का एक ही पहलू देख रहे होते है, हमे जरूरत है, सिक्के के दोनो पहलुओं को देखकर समझने की, इसलिए हमें अपनी बात तो रखनी चाहिए पर दूसरों की बात भी सब्र से सुननी चाहिए, और कभी भी बेकार की बहस में नहीं पड़ना चाहिए। 


    वेद पुराणों में भी कहा गया है कि एक सत्य को कई तरीके से बताया जा सकता है, इसलिए यदि जब अगली बार आप ऐसी किसी बहस में पड़ें तो याद कर लीजियेगा, कि कहीं ऐसा तो नहीं कि आपके हाथ में सिर्फ कान हो, और बाकी हिस्से किसी और के पास हैं।

    साभार इंटरनेट

  • चप्पलों का चक्कर !

    लेखक अज्ञात

    हंसना स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है यह एक व्यंग कहानी है । आशा है आप सभी को यह अच्छा लगेगा

    मेरी चप्पल पुरानी पड़ गई थी उन्होंने मुझे बेहद परेशान कर रखा था । वह कई बार रास्ते में चलते-चलते टूट चुकी थी, बार-बार मोची से मरम्मत करवा चुका था , मोची भी इनसे परेशान था ।

    वह 1 दिन बोला बाबूजी क्यों पैसे बर्बाद करते हैं । अब तो छुट्टी कीजिए इनकी ,मैं मोची से कहता बस अबकी बार इन्हें ठीक कर दो फिर नहीं लाऊंगा । लेकिन चप्पलों को तो बार बार टूटना था । नई खरीदने के लिए जेब में पैसे नहीं थे ।मैं फिर मोची की दुकान पर जाता मुझे देखते ही वह हंस पड़ता और कहता आ गए बाबूजी ,लाइए पहले आप की चप्पलों का इलाज कर दूं ।

    मुझे तब ऐसा लगता है जैसे डॉक्टर किसी मरते हुए मरीज को इंजेक्शन देकर जिंदा रख रहा है, रोज-रोज की परेशानी से मैं भी तंग आ गया ।आखिर एक दिन नए जूते ले ही आया । अब चप्पलों से मुझे क्या काम था ,सोचा चप्पलों को घर के बाहर नाली के किनारे रख देता हूं ,किसी को जरूरत होगी तो ले जाएगा ।

    लेकिन सुबह सफाई करने वाला आया और झाड़ू लगाते समय उसने मेरी चप्पल बाहर देखी वह फौरन उन्हें उठा लाया और आवाज लगाई बाबूजी आप भी खूब है, अपनी चप्पलों को इधर उधर रख देते हैं ,उन्हें संभालिए मैं उससे क्या कहता चुपचाप ले ली मन ही मन कहने लगा चप्पल को बाहर रख कर आया था ।

    यह घर में फिर आ गई यह मेरा साथ ही नहीं छोड़ती बहुत सोच-विचार के बाद चप्पलों को अखबार के कागज में लपेट और डोरा बांधा चप्पलों के बंडल को अपने साथ लेकर घूमने निकल गया ,उन्हें चौराहे के बीच रखकर वापस लौट आया ,छोटे साहब हमारे बाहर खेल रहे थे । उनकी नजर पड़ गई अखबार पर मेरा नाम देखा तो उठा लाए और बोले पिताजी संभालो अपनी चप्पल ,

    शायद कोई कुत्ता ले गया था चौराहे से लाया हूं, मैंने यह सब सुना तो लगा कि जैसे बिच्छू डंक मार दिया हो तो बंडल को रखवा दिया, घूमने निकला तो उसे अपने साथ ले गया और एक नीम के पेड़ के पर रख दिया पेड़ से उतर ही रहा था, कि कजोड़ मल जी मिल गए वह बोले लाल जी यहां क्या कर रहे हैं ।

    मैंने कहा कुछ नहीं बस एक दातुन तोड़ने चढ़ा था वह चले गए मैंने सोचा चलो अब तो छुटकारा मिला दूसरे दिन कजोड़ मल जी घर आ गए ,हाथ में चप्पलों का बंडल था, बोले वहीं लाल जी तुम भी खूब भुलक्कड़ हो कल दातुन तो तोड़ लाए पर चप्पलों का बंडल पेड़ पर ही छोड़ दिया ।

    यह तो मैं था जो इन्हें ले आया दूसरा होता तो पार कर जाता ,मैंने चुपचाप चप्पलों का बंडल ले लिया उन्हें धन्यवाद दिया ,चाय पिला कर उन्हें विदा किया और सोचने लगा यह चप्पल तो पीछा ही नहीं छोड़ रही हैं ।

    पहले मैं इन्हें नहीं छोड़ रहा था ,अब यह मुझे नहीं छोड़ना चाहती ।मैंने सोचा इनको कहीं गड्ढा खोदकर गाड़ दू ना रहेगा बांस ना बजेगी बांसुरी न कोई इनको देखेगा और न कोई इनको यहां लाएगा ।

    दूसरे दिन शाम को घर से दूर गया गहरा गड्ढा खोदकर बंडल को जमीन में गाड़ आया , पर वाह री किस्मत चप्पलों को गाड़ कर आया ही था ,चाय पी रहा था देखा कि मेरा पालतू झबरा कुत्ता चप्पलों को मुंह में दबाए चला आ रहा था ।बड़ी समझदारी से उसने चप्पल मेरे सामने चप्पल रख दी ,कभी दुम हिलाता तो कभी लौट कर को करतब करता ।

    जैसे कह रहा हो लाओ मेरा इनाम पर मैं उसे क्या कहता अपना माथा ठोक तारा वाह री चप्पल ।

  • कान की व्यथा – व्यंग

    मनोरंजन/डेस्क

    मैं हूँ कान… हम दो हैं… जुड़वां भाई… लेकिन हमारी किस्मत ही ऐसी है कि आज तक हमने अपने दूसरे भाई को देखा तक नहीं…

    पता नहीं कौन से श्राप के कारण हमें विपरित दिशा में चिपका कर भेजा गया है… दुख सिर्फ इतना ही नहीं है… हमें जिम्मेदारी सिर्फ सुनने की मिली है – गालियाँ हों या तालियाँ, अच्छा हो या बुरा, सब हम ही सुनते हैं…

    धीरे धीरे हमें खूंटी समझा जाने लगा… चश्मे का बोझ डाला गया, फ्रेम की डण्डी को हम पर फँसाया गया… ये दर्द सहा हमने… क्यों भाई??? चश्मे का मामला आंखो का है तो हमें बीच में घसीटने का मतलब क्या है ??? हम बोलते नहीं तो क्या हुआ, सुनते तो हैं ना… हर जगह बोलने वाले ही क्यों आगे रहते है???

    बचपन में पढ़ाई में किसी का दिमाग काम न करे तो मास्टर जी हमें ही मरोड़ते हैं…

    जवान हुए तो आदमी, औरतें सबने सुन्दर सुन्दर लौंग, बालियाँ, झुमके आदि बनवाकर हम पर ही लटकाये…
    छेदन हमारा हुआ, तारीफ चेहरे की

    और तो और श्रृंगार देखो – आँखों के लिए काजल… मुँह के लिए क्रीमें… होठों के लिए लिपस्टिक… हमने आज तक कुछ माँगा हो तो बताओ… कभी किसी कवि ने, शायर ने कान की कोई तारीफ ही की हो तो बताओ… इनकी नजर में आँखे, होंठ, गाल, ये ही सब कुछ है… हम तो जैसे किसी मृत्युभोज की बची खुची दो पूड़ियाँ हैं, जिसे उठाकर चेहरे के साइड में चिपका दिया बस…

    और तो और, कई बार बालों के चक्कर में हम पर भी कट लगते हैं … हमें डिटाॅल लगाकर पुचकार दिया जाता है…

    बातें बहुत सी हैं, किससे कहें??? कहते है दर्द बाँटने से मन हल्का हो जाता है… आँख से कहूँ तो वे आँसू टपकाती हैं… नाक से कहूँ तो वो बहाता है… मुँह से कहूँ तो वो हाय हाय करके रोता है…

    और बताऊँ… पण्डित जी का जनेऊ, टेलर मास्टर की पेंसिल, मिस्त्री की बची हुई गुटखे की पुड़िया … सब हम ही सम्भालते हैं…

    और आजकल ये नया नया मास्क का झंझट भी हम ही झेल रहे हैं… कान नहीं जैसे पक्की खूँटियाँ हैं हम…

    और भी कुछ टाँगना, लटकाना हो तो ले आओ भाई… तैयार हैं हम दोनों भाई

    सोशल मीडिया से साभार

  • सुंदरता का मूल्य

    कहानी

    एक अती सुन्दर महिला ने विमान में प्रवेश किया और अपनी सीट की तलाश में नजरें घुमाईं। उसने देखा कि उसकी सीट एक ऐसे व्यक्ति के बगल में है। जिसके दोनों ही हाथ नहीं है। महिला को उस अपाहिज व्यक्ति के पास बैठने में झिझक हुई।


    उस ‘सुंदर’ महिला ने एयरहोस्टेस से बोली “मै इस सीट पर सुविधापूर्वक यात्रा नहीं कर पाऊँगी। क्योंकि साथ की सीट पर जो व्यक्ति बैठा हुआ है उसके दोनों हाथ नहीं हैं।” उस सुन्दर महिला ने एयरहोस्टेस से सीट बदलने हेतु आग्रह किया।
    असहज हुई एयरहोस्टेस ने पूछा, “मैम क्या मुझे कारण बता सकती है..?”
    ‘सुंदर’ महिला ने जवाब दिया “मैं ऐसे लोगों को पसंद नहीं करती। मैं ऐसे व्यक्ति के पास बैठकर यात्रा नहीं कर पाउंगी।”


    दिखने में पढी लिखी और विनम्र प्रतीत होने वाली महिला की यह बात सुनकर एयरहोस्टेस अचंभित हो गई। महिला ने एक बार फिर एयरहोस्टेस से जोर देकर कहा कि “मैं उस सीट पर नहीं बैठ सकती। अतः मुझे कोई दूसरी सीट दे दी जाए।”


    एयरहोस्टेस ने खाली सीट की तलाश में चारों ओर नजर घुमाई, पर कोई भी सीट खाली नहीं दिखी।
    एयरहोस्टेस ने महिला से कहा कि “मैडम इस इकोनोमी क्लास में कोई सीट खाली नहीं है, किन्तु यात्रियों की सुविधा का ध्यान रखना हमारा दायित्व है। अतः मैं विमान के कप्तान से बात करती हूँ। कृपया तब तक थोडा धैर्य रखें।” ऐसा कहकर होस्टेस कप्तान से बात करने चली गई।


    कुछ समय बाद लोटने के बाद उसने महिला को बताया, “मैडम! आपको जो असुविधा हुई, उसके लिए बहुत खेद है | इस पूरे विमान में, केवल एक सीट खाली है और वह प्रथम श्रेणी में है। मैंने हमारी टीम से बात की और हमने एक असाधारण निर्णय लिया। एक यात्री को इकोनॉमी क्लास से प्रथम श्रेणी में भेजने का कार्य हमारी कंपनी के इतिहास में पहली बार हो रहा है।”
    ‘सुंदर’ महिला अत्यंत प्रसन्न हो गई, किन्तु इसके पहले कि वह अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करती और एक शब्द भी बोल पाती… एयरहोस्टेस उस अपाहिज और दोनों हाथ विहीन व्यक्ति की ओर बढ़ गई और विनम्रता पूर्वक उनसे पूछा “सर, क्या आप प्रथम श्रेणी में जा सकेंगे..? क्योंकि हम नहीं चाहते कि आप एक अशिष्ट यात्री के साथ यात्रा कर के परेशान हों।


    यह बात सुनकर सभी यात्रियों ने ताली बजाकर इस निर्णय का स्वागत किया। वह अति सुन्दर दिखने वाली महिला तो अब शर्म से नजरें ही नहीं उठा पा रही थी।
    तब उस अपाहिज व्यक्ति ने खड़े होकर कहा, “मैं एक भूतपूर्व सैनिक हूँ। और मैंने एक ऑपरेशन के दौरान कश्मीर सीमा पर हुए बम विस्फोट में अपने दोनों हाथ खोये थे। सबसे पहले, जब मैंने इन देवी जी की चर्चा सुनी, तब मैं सोच रहा था। की मैंने भी किन लोगों की सुरक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डाली और अपने हाथ खोये..?

    लेकिन जब आप सभी की प्रतिक्रिया देखी तो अब अपने आप पर गर्व महसूस हो रहा है कि मैंने अपने देश और देशवासियों की खातिर अपने दोनों हाथ खोये।”और इतना कह कर, वह प्रथम श्रेणी में चले गए।
    ‘सुंदर’ महिला पूरी तरह से शर्मिंदा होकर सर झुकाए सीट पर बैठ गई।
    अगर विचारों में उदारता नहीं है तो ऐसी सुंदरता का कोई मूल्य नहीं है ।

    नरेंद्र जी के फेसबुक वॉल से

  • स्वर्ग और नर्क

    कहानी

    एक बार जापान के संत हाइकुन के पास एक सैनिक आया और उसने प्रश्न किया महाराज स्वर्ग और नर्क अस्तित्व में है ?

    या केवल उनका हौआ बना दिया गया है । संत ने उसकी और आपात मस्तक देखकर पूछा तुम्हारा पेशा क्या है ।

    जी मैं सिपाही हूं ,उसने उत्तर दिया संत ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा, क्या कहा तुम सिपाही हो मगर चेहरे से तो तुम कोई भिखारी मालूम पड़ते हो ।

    तुम्हें जिसने भर्ती किया है वह निश्चित ही कोई अहमक होगा । यह सुनते ही वह सैनिक आग बबूला हो गया और उसका हाथ तलवार की और गया यह देख हायकुन बोले अच्छा तुम साथ में तलवार भी रखते हो ।

    मगर इसकी धार पैनी नहीं मालूम पड़ती । फिर इससे मेरा सिर कैसे उड़ा पाओगे । इन शब्दों ने उसको उसकी क्रोधाग्नि में घी का काम किया, उसने झट से म्यान से तलवार खींच ली तब संत बोले लो नरक के द्वार खुल गए । 

    शब्द उसके कानों तक पहुंच भी ना पाए थे उसने महसूस किया कि सामने तलवार देखकर भी यह साधु शांत बैठा हुआ है ।

    उसकी क्रोधाग्नि एकदम शांत हो गई उनका आत्म संयम देख उसने तलवार म्यान में रख दी ,तब संत बोले लो अब स्वर्ग के द्वार खुल गए ।

  • परमात्मा का कार्य ?

     
    एक औरत रोटी बनाते बनाते मंत्र जाप कर रही थी, अलग से पूजा का समय कहाँ निकाल पाती थी बेचारी, तो बस काम करते करते ही…।


    एकाएक धड़ाम से जोरों की आवाज हुई और साथ मे दर्दनाक चीख। कलेजा धक से रह गया जब आंगन में दौड़ कर झांकी तो आठ साल का चुन्नू चित्त पड़ा था,  खुन से लथपथ।

    मन हुआ दहाड़ मार कर रोये। परंतु घर मे उसके अलावा कोई था नही, रोकर भी किसे बुलाती, फिर चुन्नू को संभालना भी तो था। दौड़ कर  नीचे गई तो देखा चुन्नू आधी बेहोशी में माँ माँ की रट लगाए हुए है।


    अंदर की ममता ने आंखों से निकल कर अपनी मौजूदगी का अहसास करवाया।* फिर 10 दिन पहले करवाये अपेंडिक्स के ऑपरेशन के बावजूद ना जाने कहाँ से इतनी शक्ति आ गयी कि चुन्नू को गोद मे उठा कर पड़ोस के नर्सिंग होम की ओर दौड़ी। *रास्ते भर भगवान को जी भर कर कोसती रही, बड़बड़ाती रही, हे प्रभु क्या बिगाड़ा था मैंने तुम्हारा, जो मेरे ही बच्चे को..।

    प्रतीकात्मक तस्वीर । सोशल मीडिया से ।


    खैर डॉक्टर साहब मिल गए और समय पर इलाज होने पर चुन्नू बिल्कुल ठीक हो गया। चोटें गहरी नही थी, ऊपरी थीं तो कोई खास परेशानी नही हुई।…


    रात को घर पर जब सब टीवी देख रहे थे तब उस औरत का मन बेचैन था। भगवान से विरक्ति होने लगी थी। एक मां की ममता प्रभुसत्ता को चुनौती दे रही थी।

    उसके दिमाग मे दिन की सारी घटना चलचित्र की तरह चलने लगी। कैसे चुन्नू आंगन में गिरा की एकाएक उसकी आत्मा सिहर उठी, कल ही तो पुराने चापाकल का पाइप का टुकड़ा आंगन से हटवाया है, ठीक उसी जगह था जहां चिंटू गिरा पड़ा था। अगर कल मिस्त्री न आया होता तो..?

    उसका हाथ अब अपने पेट की तरफ गया जहां टांके अभी हरे ही थे, ऑपरेशन के। आश्चर्य हुआ कि उसने 20-22 किलो के चुन्नू को उठाया कैसे, कैसे वो आधा किलोमीटर तक दौड़ती चली गयी? फूल सा हल्का लग रहा था चुन्नू। वैसे तो वो कपड़ों की बाल्टी तक छत पर नही ले जा पाती।

    फिर उसे ख्याल आया कि डॉक्टर साहब तो 2 बजे तक ही रहते हैं और जब वो पहुंची तो साढ़े 3 बज रहे थे, उसके जाते ही तुरंत इलाज हुआ, मानो किसी ने उन्हें रोक रखा था।
    उसका सर प्रभु चरणों मे श्रद्धा से झुक गया। अब वो सारा खेल समझ चुकी थी। मन ही मन प्रभु से अपने शब्दों के लिए क्षमा मांगी।

    भगवान कहते हैं, “मैं तुम्हारे आने वाले संकट रोक नहीं सकता, लेकिन तुम्हे इतनी शक्ति दे सकता हूँ कि तुम आसानी से उन्हें पार कर सको, तुम्हारी राह आसान कर सकता हूँ। बस धर्म के मार्ग पर चलते रहो।”
    उस औरत ने घर के मंदिर में झांक कर देखा, लगा भगवान मुस्करा रहे थे।
    साभार :-सोशल मीडिया से 

  • रेखाओं से शिक्षा ?

    कहानी


    स्वामी रामतीर्थ जब प्राध्यापक थे तब उन्होंने एक दिन अपने छात्रों के सामने काले तख्ते पर खड़िया से एक रेखा खींचकर कहा इसे बिना मिटाए छोटी करके दिखाओ । 

    एक कुशाग्र बुद्धि बालक ने उसी रेखा के समीप एक दूसरी बड़ी रेखा खींच दी और पहले खींची हुई रेखा को बिना मिटाए ही छोटा करके दिखा दिया ।


     इस पर रामतीर्थ बड़े ही प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा

    छात्रों यही क्रम तुम्हें अपने जीवन में अपनाना है।
     यदि तुम बड़े बनना चाहते हो तो उसके लिए अपने आसपास के लोगों को पीछे धकेलने की जरूरत नहीं है तुम बड़े काम करो और बड़े बनो तब दूसरे तुम से छोटे दिखाई देने लगेंगे ।

  • सत्य की ताकत

    कहानी संग्रह

    एक दिन एक बहू ने गलती से यज्ञवेदी में थूक दिया !!!
    सफाई कर रही थी, मुंह में सुपारी थी…..पीक आया तो वेदी में थूक दिया पर उसे यह देखकरआश्चर्य हुआ कि उतना थूक तत्काल स्वर्ण में बदल गया है। अब तो वह प्रतिदिन जान बूझकर वेदी में थूकने लगी और उसके पास धीरे धीरे स्वर्ण बढ़ने लगा।
    महिलाओं में बात तेजी से फैलती है। कई और महिलाएं भी अपने अपने घर में बनी यज्ञवेदी में थूक-थूक कर सोना उत्पादन करने लगी।

    धीरे धीरे पूरे गांव में यह सामान्य चलन हो गया,
    सिवाय एक महिला के…
    उस महिला को भी अनेक दूसरी महिलाओं ने उकसाया….. समझाया…..
    “अरी…..तू क्यों नहीँ थूकती ?”

    “महिला बोली…..जी बात यह है कि मैं अपने पति की अनुमति बिना यह कार्य हरगिज नहीँ करूंगी और जहाँ तक मुझे ज्ञात है वे इसकी अनुमति कभी भी नहीँ देंगे।”

    किन्तु ग्रामीण महिलाओं ने ऐसा वातावरण बनाया….. कि आखिर उसने एक रात डरते डरते अपने ‎पति‬ से पूछ ही लिया। “खबरदार जो ऐसा किया तो….. !! यज्ञवेदी क्या थूकने की चीज है ?” पति की गरजदार चेतावनी के आगे बेबस वह महिला चुप हो गई….पर जैसा वातावरण था और जो चर्चाएं होती थी, उनसे वह साध्वी स्त्री बहुत व्यथित रहने लगी। खास कर उसके सूने गले को लक्ष्य कर अन्य स्त्रियां अपने नए नए कण्ठ-हार दिखाती तो वह अन्तर्द्वन्द में घुलने लगी। पति की व्यस्तता और स्त्रियों के उलाहने उसे धर्मसंकट में डाल देते। वह सोचती थी कि यह शायद “मेरा दुर्भाग्य है….. अथवा कोई पूर्वजन्म का पाप…..कि एक सती स्त्री होते हुए भी मुझे एक रत्ती सोने के लिए भी तरसना पड़ता है।”

    सांकेतिक तस्वीर । साभार

    “शायद यह मेरे पति का कोई गलत निर्णय है।”
    “ओह !!! इस धर्माचरण ने मुझे दिया ही क्या है ?”
    “जिस नियम के पालन से ‎दिल‬ कष्ट पाता रहे। उसका पालन क्यों करूं ?”…और हुआ यह कि वह बीमार रहने लगी। ‎पतिदेव‬ इस रोग को ताड़ गए। उन्होंने एक दिन ब्रह्म मुहूर्त में ही सपरिवार ग्राम त्यागने का निश्चय किया। गाड़ी में सारा सामान डालकर वे रवाना हो गए। सूर्योदय से पहले पहले ही वे बहुत दूर निकल जाना चाहते थे।

    किन्तु…..अरे !!! यह क्या….. ??? ज्यों ही वे गांव की कांकड़ (सीमा) से बाहर निकले तो पीछे भयानक विस्फोट हुआ और पूरा गांव धू धू कर जल रहा था। सज्जन दम्पत्ति अवाक् रह गए और उस स्त्री को अपने पति का महत्त्व समझ आ गया। वास्तव में….. इतने दिन गांव बचा रहा, तो केवल इस कारण…..कि धर्माचरण करने वाला उसका परिवार, गांव की परिधि में था।

    धर्माचरण करते रहें…..
    कुछ पाने के लालच में इंसान बहुत कुछ खो बैठता है……इसलिए लालच से बचें…..न जाने किसके भाग्य से आपका जीवन सुखमय व सुरक्षित है

    परहित धर्म का भी पालन करते रहिए क्योंकि….. व्यक्तिगत स्वार्थ पतन का कारण बनता है ।

    सोशल मीडिया से साभार