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  • धर्म :कल है कालाष्टमी, इस दिन काल भैरव की पूजा करने से मिलती है रोगों से मुक्ति

    प्रस्तुति /प्रदीप श्रीवास्तव


    हिंदू मान्यता के अनुसार हर महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी मनाई जाती है. इस बार 2 जून को कालाष्टमी मनाई जाएगी. इस दिन भगवान काल भैरव की पूजा की जाती है. उन्हें शिव का पांचवा अवतार माना गया है. ऐसा भी मान्यता है कि भैरव शब्द के तीन अक्षरों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की शक्ति समाहित है. इन्हें काशी के कोतवाल भी कहा जाता है. सकता. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कालाष्टमी के दिन भगवान भैरव की पूजा अर्चना करने से व्यक्ति भयमुक्त होता है और उसके जीवन की कई परेशानियां दूर हो जाती है और रोगों से मुक्ति मिलती है.







    कालाष्टमी पूजा शुभ मुहूर्त:


    ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष अष्टमी आरंभ – 02 जून रात्रि 12 बजकर 46 मिनट से ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष अष्टमी समाप्त – 03 जून रात्रि 01 बजकर 12 मिनट पर

    कालाष्टमी व्रत का महत्व:


    काल भैरव को भगवान शिव का रौद्र रूप माना जाता है.वह समस्त पापों और रोगों का नाश करने वाले हैं.हिंदू शास्त्रों के अनुसार कालाष्टमी के दिन श्रद्धापूर्वक वर्त रखने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है.इस दिन व्रत रखकर कुंडली में मौजूद राहु के दोष से भी मुक्ति मिलती है.इसके साथ ही शनि ग्रह के बुरे प्रभावों से भी काल भैरव की पूजा करके बचा जा सकता है.तंत्र साधन करने वाले लोगों के लिए भी कालाष्टमी का दिन बहुत खास होता है.


    काल-भैरव पूजा विधि:


    कालाष्टमी के दिन भक्तों को सुबह नहा-धोकर भगवान काल भैरव की पूजा अर्चना करनी चाहिए. व्रती को पूरे दिन उपवास करना चाहिए और रात्रि के समय धूप, दीप, धूप,काले तिल,उड़द, सरसों के तेल का दिया बनाकर भगवान काल भैरव की आरती गानी चाहिए.
    मान्यता के अनुसार, भगवान काल भैरव का वाहन कुत्ता है इसलिए जब व्रती व्रत खोलें तो उसे अपने हाथ से कुछ पकवान बनाकर सबसे पहले कुत्ते को भोग लगाना चाहिए. ऐसा करने से भगवान काल भैरव की कृपा आती है. पूरे मन से काल भैरव भगवान के पूजा करने पर भूत, पिचाश, प्रेत और जीवन में आने वाली सभी बाधाएं अपने आप ही दूर हो जाती हैं.






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  • गणेश जी ने क्यों दिया चंद्रमा को श्राप…

    धर्म /डेस्क


    नाटा कद, मोटा पेट, गज का सिर और मूषक को अपनी सवारी बनाने वाले भगवान गणेश सनातन धर्म में विध्नहर्ता के नाम से जाने जाते हैं।कहते हैं कि एक बार कुबेर जी भगवान शिव और माता पार्वती के पास आमंत्रण लेकर कैलाश पर्वत पहुंचे। वे चाहते थे कि शिव तथा पार्वती उनके महल आकर भोजन करें। मगर शिवजी कुबेर की मंशा समझ चुके थे। वे जानते थे कि कुबेर अपनी धन सम्पति का दिखावा करने के लिए उन्हें महल में आमंत्रित कर रहे हैं।

    उन्होंने किसी महत्वपूर्ण कार्य में उलझे होने का कारण बताते हुए आने से मना कर दिया। ऐसे में कुबेर दुखी हो गया और शिवजी से प्रार्थना करने लगे। तब गणेशजी ने मुस्कुरा कर कहा कि अगर आपको हमारी सेवा करनी है तो हमारे पुत्र को अपने साथ ले जाओ।मिठाइयों के शौकीन गणेश जी ने उस रात महल में भरपेट भोजन किया और खूब मिठाइयां खाईं। इतना ही नहीं जाते जाते वे ज्येष्ठ भ्राता के लिए भी मिठाइयां साथ ले गए। अब गोद में मिठाइयां रखकर वो मूषक पर सवार हो गए। रात का अंधेरा था, मगर चांद चमक रहा था। तभी मूषक ने रास्ते में एक सांप देखा और वो उछल पड़ा।






    अब गणेशजी अपना संतुलन खो बैठे और सारी मिठाइयां धरती पर बिखर गईं।मिठाइयां इकट्ठा करते हुए उन्हें किसी के हंसने की आवाज़ सुनाई दी। उन्होंने आकाश की ओर देखा तो चंद्रमा हंस रहा था। वे पल भर के लिए क्रोध से भर गए और चंद्रमा को चेतावनी देते हुए बोले कि तुम मेरी मदद करने की बजाय मुझपर हंस रहे हो, मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम आज के बाद इस विशाल गगन पर राज नहीं कर पाओगे। कोई भी तुम्हारी रोशनी को आज के बाद महसूस नहीं करेगा। ये सुनते ही चंद्रमा की रोशनी समाप्त हो गई।
    अब चंद्रमा गणेशजी से मांगी मांगने लगे और बोले कृप्या मुझे माफ कर दीजिए और अपना श्राप वापिस ले लीजिए।

    उन्होंने चंद्रमा को माफ कर दिया और बोले की अपना श्राप तो वापिस नहीं ले सकता मगर इसके असर को कम ज़रूर कर सकता हूं। उन्होंने कहा कि ऐसा अवश्य होगा कि तुम अपनी रोशनी खो दोगे, लेकिन ऐसा माह में सिर्फ एक बार होगा। इसके बाद तुम फिर से बढ़ते जाओगे और पंद्रह दिनों के अंतराल में अपने वेश में नज़र आओगे। उन्होंने एक चेतावनी भी दी कि चतुर्थी के दिन मेरा अपमान किया है इसलिए जो भी मेरा भक्त इस दिन तुम्हें देखेगा, तो उसके लिए ये अशुभ होगा।






  • धर्म :अज्ञान का नाश करता है शिव का तीसरा नेत्र

    धर्म/डेस्क

    रामचरित मानस के अनुसार तारका नाम का एक असुर हुआ उसने सभी देवताओं को हराकर तीनों लोकों को जीत लिया। वह अमर था। इसीलिए देवता उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे। आखिर में सभी देवता उसके आतंक से परेशान होकर ब्रह्माजी के पास पहुंचे। तब ब्रह्माजी ने देवताओं को बताया कि इस असुर का संहार सिर्फ शिव पुत्र के द्वारा ही हो सकता है। तब सभी देवता चिंतित हो गए क्योंकि सती के देह त्याग के बाद से शिव समाधि में बैठे थे। तब ब्रह्माजी बोले कि सती ने देह त्याग के बाद हिमालय के यहां जन्म लिया है।


    उन्होंने पार्वती के रूप में शिव को पाने के लिए बहुत तप किया लेकिन वे तो समाधि लगाकर बैठे हैं। इसलिए आप लोग जाकर कामदेव को शिवजी के पास भेजो ताकि उनके मन में काम का भाव उत्पन्न हो। इसके अलावा कोई उपाय नहीं है। देवताओं ने जब कामदेव को जाकर सारी बात बताई। तब कामदेव फूलों का धनुष लेकर निकल पड़े। उनके प्रभाव से सभी पशु-पक्षी काम के बस में हो गए। लेकिन जब कामदेव शिव के पास पहुंचे तो वे डर गए।


    उन्होंने शिव को मनाने के लिए बसंत को भेजा लेकिन शिव की समाधि नहीं टूटी। जब कामदेव सारी कोशिश कर हार गए। तब उन्होंने शिव पर काम के पांच बाण चलाए। क्रोध के कारण शिव का तीसरा नेत्र खुलया और जैसे ही उन्होंने कामदेव को देखा तो वे जलकर भस्म हो गए। साधारण रूप में देखें तो शिव ईश्वर हैं और बुरे लोगों को अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से जलाकर भस्म कर देते है और यदि अलग तरह से देखने का प्रयत्न करें तो शिव का तीसरा नेत्र ज्ञान पुंज है जो अज्ञान का नाश करता है!

  • सूर्यदेव के कारण भगवान राम बने राजा रामचंद्र !

    धर्म/डेस्क

    सूर्यदेव के कारण भगवान राम बने राजा रामचंद्र
    जब भगवान का प्राकट्य अयोध्या जी में हुआ तो सूर्य नारायण भगवान बड़े प्रसन्न हुए ।

    कि मेरे वंश में भगवान का प्राकट्य हो गया, और आनंद में भर कर एक क्षण के लिए रुक गए.
    सूर्य कि गति कभी नहीं रुकती परन्तु एक क्षण को रुक गई, जब देखा राजभवन में अति कोमल वाणी से वेद ध्वनि हो रही है,


    अबीर गुलाल उड़ रहा है, अयोध्या में उत्सव को देखकर सूर्य भगवान अपना रथ हाँकना ही भूल गए.
    मास दिवस कर दिवस भा मरम ना जाने कोइ
    रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन विधि होइ


    अर्थात – महीने भर का दिन हो गया, इस रहस्य को कोई नहीं जानता, सूर्य अपने रथ सहित वही रुक गए फिर रात किस तरह होती.


    सब जगह आनंद ही आनंद छाया था परन्तु चंद्रमा रो रहे थे.


    भगवान ने पूंछा – चन्द्रमा ! सब ओर आनंद छाया है, क्या मेरे प्राकट्य पर तुम्हे प्रसन्नता नहीं हुई..?
    चन्द्रमा बोला – प्रभु ! सब तो आपके दर्शन कर रहे है इसलिए प्रसन्न है परन्तु मै कैसे दर्शन करूँ ?
    प्रभु बोले- क्यों, क्या बात है ?
    चंद्रमा बोले – आज तो सूर्य नारायण हटने का नाम ही नहीं ले रहे और जब तक वे हटेगे नहीं मै कैसे आ सकता हूँ,


    प्रभु बोले थोडा इंतजार कीजिए ! अभी सूर्य की बारी है उनके ही वंश में जन्म लिया है न इसलिए आनंद समाता नहीं है उनका,


    अगली बार चन्द्र वंश में आऊंगा, अभी दिन के बारह बजे आया फिर रात के बारह बजे आऊंगा तब जी भर के दर्शन करना, तब तक आप इंतजार करो.


    चंद्र बोले – प्रभु ! द्वापर के लिए बहुत समय है. तब तक मेरा क्या होगा.में तो इंतजार करते-करते मर ही जाऊँगा.
    भगवान बोले – कोई बात नहीं में अपने नाम के साथ तुम्हारा नाम जोड़ लेता हूँ. रामचंद्र, सभी मुझे रामचंद्र कहेगे,


    सूर्य वंश में जन्म लिया है, फिर भी कोई मुझे राम सिंह तो नहीं कहेगा, और जिसके नाम के आगे मै हूँ, वह कैसे मर सकता है।


    वह तो अमर हो जाता है, इसलिए तुम भी अब कैसे मरोगे, इतना सुनते ही चंद्रमा बड़े प्रसन्न हुए और इस तरह भगवान राम के नाम के साथ चन्द्र देव के जुड़ने के बाद उनका नाम रामचंद्र हो गया ।

    साभार

  • धर्म :क्यों की जाती है गुरुवार के दिन केले के पेड़ की पूजा ?

    धर्म/डेस्क

    शास्त्रों में गुरुवार के दिन को केले के पेड़ की पूजा को का काफी महत्व है. इतना ही नहीं केले के पत्तों को शुभ और उसकी पूजा को भी लाभकारी माना गया है. धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक केले के पेड़ में साक्षात देवगुरु बृहस्पति का वास होता है. इसके अलावा गुरुवार को केले के पेड़ की पूजा करने से बृहस्पति ग्रह मजबूत होता है और ऐसे लोगों की शादी में रुकावटें नहीं आतीं. यही नहीं उसकी सभी मनोकामनाएं भी पूरी हो जाती हैं. गुरुवार को केले के पेड़ की पूजा करने वाले व्यक्त‍ि के परिवार की आर्थिक स्थिति भी मजबूत होती है और परिवार में खुशियां भी आती हैं.

    हिंदू धर्म में महत्‍व


    हिन्दू धर्म में केले के पेड़ का खास महत्व है. इसे सबसे शुभ पेड़ों में से एक माना गया है. इसलिए खासतौर से हरि की पूजा में इसका इस्तेमाल जरूर होता है. भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी को केला चढ़ाने से घर में सुख व समृद्धि आती है. वैवाहिक जीवन सुखी होता है. यदि कोई व्यक्ति मांगलिक दोष से पीड़ित है तो ऐसे व्यक्ति की अगर केले के पेड़ से शादी करा दी जाए तो उसका मांगलिक दोष खत्म हो जाता है. केले के पेड़ का हर एक हिस्सा उपयोगी होता है. जड़, तना, पत्तियां और फल. हर एक हिस्से से केले का पेड़ बहुत उपयोगी है. यहां तक कि यदि आपको पुखराज रत्न धारण करना है और ऐसा नहीं कर पा रहे हैं तो केले की जड़ पहन लें. पुखराज से जितना लाभ होगा, उतना ही केले की जड़ से भी होगा.

    गुरुवार को ऐसे करें केले के पेड़ की पूजा

    सुबह-सुबह मौन व्रत का पालन कर स्नान करें। इसके बाद केले के वृक्ष को प्रणाम कर जल चढ़ाएं।
    इस बात का ध्यान रखें कि घर की आंगन में यदि केले का वृक्ष लगा है तो उस पर जल ना चढ़ाएं. बाहर के केले के वृक्ष को जल चढ़ाएं।
    केले के वृक्ष पर हल्दी की गांठ, चने की दाल और गुड़ केल को अर्पित करें।
    अक्षत, पुष्प आदि चढ़ाएं और केले के पेड़ की परिक्रमा करें।
    इस मंत्र का जाप करें…

    ॐ बृं बृहस्पते नम:

    बृहस्पति मंगल मंत्र-

    जीवश्चाङ्गिर-गोत्रतोत्तरमुखो दीर्घोत्तरा संस्थित:

    पीतोश्वत्थ-समिद्ध-सिन्धुजनिश्चापो थ मीनाधिप:।

    सूर्येन्दु-क्षितिज-प्रियो बुध-सितौ शत्रूसमाश्चाप रे

    सप्ताङ्कद्विभव: शुभ: सुरुगुरु: कुर्यात् सदा मङ्गलम्।।

    साभार

  • विश्वासघात सबसे बड़ा छल होता है

    धर्म /डेस्क

    ?महाभारत युद्ध समाप्त होने पर धृतराष्ट्र ने श्रीकृष्ण से पूछा- मैं अंधा पैदा हुआ, सौ पुत्र मारे गए । भगवन मैंने ऐसा कौन सा पाप किया है, जिसकी सजा मिल रही है।

    श्रीकृष्ण ने बताना शुरू किया- पिछले जन्म में आप एक राजा थे. आपके राज्य में एक तपस्वी ब्राह्मण थे। उनके पास हंसों का एक जोड़ा था जिसके चार बच्चे थे।

    ब्राह्मण को तीर्थयात्रा पर जाना था लेकिन हंसों की चिंता में वह जा नहीं पा रहे थे। उसने अपनी चिंता एक साधु को बताई। साधु ने कहा- तीर्थ में हंसों को बाधक बताकर हंसों का अगला जन्म खराब क्यों करते हो। राजा प्रजापालक होता है। तुम और तुम्हारे हंस दोनों उसकी प्रजा हो। हंसों को राजा के संरक्षण में रखकर तीर्थ को जाओ।

    ब्राह्मण हंस और उसके बच्चे आपके पास रखकर तीर्थ को गए। आपको एक दिन मांस खाने की इच्छा हुई। आपने सोचा सभी जीवों का मांस खाया है पर हंस का मांस नहीं खाया। आपने हंस के दो बच्चे भूनकर खा लिए। आपको हंस के मांस का स्वाद लग गया। हंस के एक-एक कर सौ बच्चे हुए और आप सबको खाते गए। अंततः हंस का जोड़ा मर गया।

    कई साल बाद वह ब्राह्मण लौटा और हंसों के बारे में पूछा तो आपने कह दिया कि हंस बीमार होकर मर गए। आपने तीर्थयात्रा पर गए उस व्यक्ति के साथ विश्वासघात किया जिसने आप पर अंधविश्वास किया था। आपने प्रजा की धरोहर में डाका डालकर राजधर्म भी नहीं निभाया।

    जिह्वा के लालच में पड़कर हंस के सौ बच्चे भूनकर खाने के पाप से आपके सौ पुत्र हुए जो लालच में पड़कर मारे गए। आप पर आंख मूंदकर भरोसा करने वाले से झूठ बोलने और राजधर्म का पालन नहीं करने के कारण आप अंधे और राजकाज में विफल व्यक्ति हो गए।

    श्रीकृष्ण ने कहा- सबसे बड़ा छल होता है विश्वासघात. आप उसी पाप का फल भोग रहे हैं।

    ।। श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी,हे नाथ नारायण वासुदेवा।।

    साभार :सोशल मीडिया

  • धर्म :चरणा मृत का महत्व

    धर्म/डेस्क

    अक्सर जब हम मंदिर जाते है तो पंडित जी हमें भगवान का चरणामृत देते है,
    क्या कभी हमने ये जानने की कोशिश की कि चरणामृतका क्या महत्व है,

    ❋━━► शास्त्रों में कहा गया है

    अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्।
    विष्णो: पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ।।

    “अर्थात भगवान विष्णु के चरण का अमृत रूपी जल समस्त पाप -व्याधियों का शमन करने वाला है तथा औषधी के समान है।

    जो चरणामृत पीता है उसका पुनः जन्म नहीं होता” जल तब तक जल ही रहता है जब तक भगवान के चरणों से नहीं लगता, जैसे ही भगवान के चरणों से लगा तो अमृत रूप हो गया और चरणामृत बन जाता है.

    ❋━━► जब भगवान का वामन अवतार हुआ, और वे राजा बलि की यज्ञ शाला में दान लेने गए तब उन्होंने तीन पग में तीन लोक नाप लिए जब उन्होंने पहले पग में नीचे के लोक नाप लिए और दूसरे में ऊपर के लोक नापने लगे तो जैसे ही ब्रह्म लोक में उनका चरण गया तो ब्रह्मा जी ने अपने कमंडलु में से जल लेकर भगवान के चरण धोए और फिर चरणामृत को वापस अपने कमंडल में रख लिया,
    वह चरणामृत गंगा जी बन गई, जो आज भी सारी दुनिया के पापों को धोती है, ये शक्ति उनके पास कहाँ से पात्र शक्ति है भगवान के चरणों की जिस पर ब्रह्मा जी ने साधारण जल चढाया था पर चरणों का स्पर्श होते ही बन गई गंगा जी .

    जब हम बाँके बिहारी जी की आरती गाते है तो कहते है –
    “चरणों से निकली गंगा प्यारी जिसने सारी दुनिया तारी”

    धर्म में इसे बहुत ही पवित्र माना जाता है तथा मस्तक से लगाने के बाद इसका सेवन किया जाता है।
    चरणामृत का सेवन अमृत के समान माना गया है।

    कहते हैं भगवान श्री राम के चरण धोकर उसे चरणामृत के रूप में स्वीकार कर केवट न केवल स्वयं भव-बाधा से पार हो गया बल्कि उसने अपने पूर्वजों को भी तार दिया।

    चरणामृत का महत्व सिर्फ धार्मिक ही नहीं चिकित्सकीय भी है। चरणामृत का जल हमेशा तांबे के पात्र में रखा जाता है।
    आयुर्वेदिक मतानुसार तांबे के पात्र में अनेक रोगों को नष्ट करने की शक्ति होती है जो उसमें रखे जल में आ जाती है। उस जल का सेवन करने से शरीर में रोगों से लडऩे की क्षमता पैदा हो जाती है तथा रोग नहीं होते।

    ❋━━► इसमें तुलसी के पत्ते डालने की परंपरा भी है जिससे इस जल की रोगनाशक क्षमता और भी बढ़ जाती है।
    ❋━━► तुलसी के पत्ते पर जल इतने परिमाण में होना चाहिए कि सरसों का दाना उसमें डूब जाए ।
    ❋━━► ऐसा माना जाता है कि तुलसी चरणामृत लेने से मेधा, बुद्धि,स्मरण शक्ति को बढ़ाता है।

    इसीलिए यह मान्यता है कि भगवान का चरणामृत औषधी के समान है। यदि उसमें तुलसी पत्र भी मिला दिया जाए तो उसके औषधीय गुणों में और भी वृद्धि हो जाती है। कहते हैं सीधे हाथ में तुलसी चरणामृत ग्रहण करने से हर शुभ का या अच्छे काम का जल्द परिणाम मिलता है।

    इसीलिए चरणामृत हमेशा सीधे हाथ से लेना चाहिये,

    ❋━━► लेकिन चरणामृत लेने के बाद अधिकतर लोगों की आदत होती है कि वे अपना हाथ सिर पर फेरते हैं। चरणामृत लेने के बाद सिर पर हाथ रखना सही है या नहीं यह बहुत कम लोग जानते हैं.?

    दरअसल शास्त्रों के अनुसार चरणामृत लेकर सिर पर हाथ रखना अच्छा नहीं माना जाता है।
    कहते हैं इससे विचारों में सकारात्मकता नहीं बल्कि नकारात्मकता बढ़ती है।

    इसीलिए चरणामृत लेकर कभी भी सिर पर हाथ नहीं फेरना चाहिए।

    सोशल मीडिया से साभार